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राज्य के नीति-निदेशक तत्व
DIRECTIVE PRINCIPLES OF STATE POLICY

राज्य के नीति-निदेशक तत्व

लोक-कल्याणकारी राज्य, सामाजिक-आर्थिक न्याय और शासन के संवैधानिक मार्गदर्शक सिद्धांत

राज्य के नीति-निदेशक तत्व क्या हैं?

भारतीय संविधान के भाग IV में अनुच्छेद 36 से 51 तक राज्य के नीति-निदेशक तत्वों का वर्णन किया गया है। इनका उद्देश्य भारत में सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र को मजबूत करना तथा राज्य को लोक-कल्याणकारी व्यवस्था स्थापित करने की दिशा देना है।

ये सिद्धांत न्यायालय द्वारा सीधे लागू नहीं कराए जा सकते, फिर भी संविधान उन्हें देश के शासन में मूलभूत मानता है और राज्य से अपेक्षा करता है कि कानून एवं नीतियाँ बनाते समय इन्हें लागू करने का प्रयास किया जाए।

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अनुच्छेद 36 और राज्य का अर्थ

Article 36

अनुच्छेद 36 के अनुसार राज्य के नीति-निदेशक तत्वों वाले भाग IV में प्रयुक्त “राज्य” शब्द का वही अर्थ है जो मौलिक अधिकारों वाले भाग III में प्रयुक्त हुआ है।

अर्थात इन सिद्धांतों का उद्देश्य केवल केंद्र सरकार को निर्देश देना नहीं है, बल्कि संविधान में राज्य की परिभाषा के अंतर्गत आने वाले संबंधित शासन और सार्वजनिक प्राधिकारों को नीति निर्माण की दिशा देना है।

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अनुच्छेद 37 और संवैधानिक स्थिति

Article 37

अनुच्छेद 37 स्पष्ट करता है कि राज्य के नीति-निदेशक तत्व न्यायालय द्वारा सीधे प्रवर्तनीय नहीं हैं।

इसके बावजूद संविधान इन्हें देश के शासन में मूलभूत मानता है और कानून बनाते समय इन्हें लागू करना राज्य का कर्तव्य माना गया है।

इसलिए इन्हें केवल “सरकार के लिए सुझाव” समझना उचित नहीं है। इनके पीछे संवैधानिक महत्व और लोक-कल्याणकारी शासन की स्पष्ट दिशा मौजूद है।

🎯 सबसे महत्वपूर्ण

नीति-निदेशक तत्व न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं, लेकिन शासन में मूलभूत हैं।

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प्रमुख विशेषताएँ

Main Features

राज्य के नीति-निदेशक तत्व गैर-न्यायोचित हैं। इनके सीधे प्रवर्तन के लिए सामान्यतः न्यायालय में दावा नहीं किया जा सकता।

ये सरकार को कानून और सार्वजनिक नीतियाँ बनाते समय लोक कल्याण, सामाजिक न्याय और आर्थिक न्याय की दिशा प्रदान करते हैं।

भारतीय संविधान में नीति-निदेशक तत्वों की व्यवस्था पर मुख्य रूप से आयरलैंड के संविधान का प्रभाव माना जाता है।

ये संविधान की प्रस्तावना में व्यक्त न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुता जैसे व्यापक आदर्शों को व्यावहारिक सामाजिक और आर्थिक नीतियों के माध्यम से आगे बढ़ाने में सहायक हैं।

समय-समय पर संविधान संशोधनों द्वारा नीति-निदेशक तत्वों में नए प्रावधान भी जोड़े गए हैं।

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नीति-निदेशक तत्वों का वर्गीकरण

Classification

अध्ययन की सुविधा के लिए राज्य के नीति-निदेशक तत्वों को सामान्यतः समाजवादी, गांधीवादी और उदार-बौद्धिक तत्वों में वर्गीकृत किया जाता है।

ध्यान रखें कि संविधान स्वयं इन्हें इन तीन श्रेणियों में विभाजित नहीं करता। यह विद्यार्थियों और विद्वानों द्वारा समझने की सुविधा के लिए किया गया वर्गीकरण है।

कुछ अनुच्छेदों में एक से अधिक विचारधारात्मक विशेषताएँ दिखाई देती हैं। इसी कारण अलग पुस्तकों में कुछ अनुच्छेद अलग-अलग श्रेणियों में भी मिल सकते हैं।

🧠 अध्ययन का सामान्य वर्गीकरण

समाजवादी गांधीवादी उदार-बौद्धिक
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अनुच्छेद 38 — लोक-कल्याणकारी सामाजिक व्यवस्था

Article 38

अनुच्छेद 38 राज्य को ऐसी सामाजिक व्यवस्था स्थापित करने का प्रयास करने के लिए कहता है जिसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाओं को प्रभावित करे।

राज्य आय, प्रतिष्ठा, सुविधाओं और अवसरों में मौजूद असमानताओं को कम करने का प्रयास करेगा।

यह अनुच्छेद भारत के लोक-कल्याणकारी राज्य के विचार और सामाजिक-आर्थिक न्याय का महत्वपूर्ण आधार है।

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अनुच्छेद 39 — राज्य की नीति के प्रमुख सिद्धांत

Article 39

राज्य अपनी नीति इस प्रकार संचालित करेगा कि पुरुष और महिला सभी नागरिकों को जीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का समान अधिकार मिले।

समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण इस प्रकार वितरित किया जाए कि वह सामान्य हित की सर्वोत्तम सेवा करे।

आर्थिक व्यवस्था इस प्रकार संचालित न हो कि धन और उत्पादन के साधनों का संकेंद्रण समाज के लिए हानिकारक बन जाए।

पुरुषों और महिलाओं को समान कार्य के लिए समान वेतन प्रदान करने की दिशा में राज्य नीति बनाए।

पुरुष और महिला श्रमिकों के स्वास्थ्य एवं शक्ति तथा बच्चों की कोमल आयु का दुरुपयोग न हो।

बच्चों को स्वस्थ और सम्मानपूर्ण वातावरण में विकास के अवसर मिलें तथा उन्हें शोषण और नैतिक एवं भौतिक परित्याग से सुरक्षा प्राप्त हो।

🎯 अनुच्छेद 39 याद रखें

जीविका + संसाधनों का जनहित में वितरण + धन के संकेंद्रण की रोकथाम + समान कार्य का समान वेतन + श्रमिक और बाल संरक्षण।

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अनुच्छेद 39A — समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता

Article 39A

अनुच्छेद 39A राज्य को ऐसी विधिक व्यवस्था सुनिश्चित करने की दिशा देता है जिसमें न्याय समान अवसर के आधार पर उपलब्ध हो।

आर्थिक या अन्य अक्षमता के कारण कोई व्यक्ति न्याय से वंचित न रहे, इसके लिए राज्य निःशुल्क विधिक सहायता उपलब्ध कराने का प्रयास करेगा।

अनुच्छेद 39A को 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा जोड़ा गया।

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अनुच्छेद 41 — काम, शिक्षा और सार्वजनिक सहायता

Article 41

अनुच्छेद 41 राज्य को अपनी आर्थिक क्षमता और विकास की सीमाओं के भीतर काम, शिक्षा और सार्वजनिक सहायता के प्रभावी प्रावधान करने का निर्देश देता है।

यह सहायता बेरोजगारी, वृद्धावस्था, बीमारी, विकलांगता तथा अन्य अभाव की परिस्थितियों में महत्वपूर्ण मानी गई है।

इसे सीधे और असीमित रोजगार का मौलिक अधिकार नहीं समझना चाहिए।

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अनुच्छेद 42 — मानवोचित कार्य दशाएँ और प्रसूति सहायता

Article 42

अनुच्छेद 42 राज्य को न्यायसंगत और मानवोचित कार्य दशाओं तथा प्रसूति सहायता के लिए प्रावधान करने की दिशा देता है।

इसका उद्देश्य कार्यस्थल पर मानवीय परिस्थितियाँ सुनिश्चित करना और मातृत्व से संबंधित सामाजिक सुरक्षा को बढ़ावा देना है।

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अनुच्छेद 43 — श्रमिक और कुटीर उद्योग

Article 43

अनुच्छेद 43 राज्य को श्रमिकों के लिए काम, जीवन-निर्वाह योग्य मजदूरी, सम्मानजनक जीवन-स्तर, अवकाश तथा सामाजिक और सांस्कृतिक अवसर उपलब्ध कराने की दिशा देता है।

इसी अनुच्छेद में राज्य को विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में व्यक्तिगत या सहकारी आधार पर कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए भी कहा गया है।

इसी कारण अनुच्छेद 43 में समाजवादी और गांधीवादी दोनों प्रकार की विशेषताएँ दिखाई देती हैं।

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अनुच्छेद 43A — उद्योगों में श्रमिकों की भागीदारी

Article 43A

अनुच्छेद 43A राज्य को उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए उचित कदम उठाने की दिशा देता है।

इसे 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा जोड़ा गया।

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अनुच्छेद 43B — सहकारी समितियाँ

Article 43B

अनुच्छेद 43B राज्य को सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन, स्वायत्त कार्यप्रणाली, लोकतांत्रिक नियंत्रण और व्यावसायिक प्रबंधन को बढ़ावा देने की दिशा देता है।

यह अनुच्छेद 97वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2011 द्वारा जोड़ा गया।

यह बाद में जोड़ा गया महत्वपूर्ण नीति-निदेशक तत्व है और प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछा जा सकता है।

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अनुच्छेद 47 — पोषण, लोक स्वास्थ्य और मद्यनिषेध

Article 47

अनुच्छेद 47 राज्य को जनता के पोषण स्तर और जीवन स्तर को ऊँचा उठाने तथा लोक स्वास्थ्य में सुधार करने का कर्तव्य देता है।

राज्य औषधीय प्रयोजन को छोड़कर स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मादक पेय और नशीले पदार्थों के सेवन को रोकने की दिशा में भी प्रयास करेगा।

इसी मद्यनिषेध संबंधी पक्ष के कारण अनुच्छेद 47 को गांधीवादी तत्वों से भी जोड़ा जाता है।

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अनुच्छेद 40 — ग्राम पंचायतें

Article 40

अनुच्छेद 40 राज्य को ग्राम पंचायतों का संगठन करने और उन्हें ऐसी शक्तियाँ एवं अधिकार प्रदान करने की दिशा देता है जिससे वे स्वशासन की इकाइयों के रूप में कार्य कर सकें।

यह महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज की भावना से निकटता के कारण प्रमुख गांधीवादी नीति-निदेशक तत्व माना जाता है।

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अनुच्छेद 46 — कमजोर वर्गों का कल्याण

Article 46

अनुच्छेद 46 राज्य को जनता के कमजोर वर्गों, विशेष रूप से अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों, के शैक्षिक और आर्थिक हितों को विशेष सावधानी से बढ़ावा देने की दिशा देता है।

राज्य इन वर्गों को सामाजिक अन्याय और सभी प्रकार के शोषण से भी सुरक्षित रखने का प्रयास करेगा।

इसे केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और “पिछड़े वर्ग” की सीमित सूची के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए। अनुच्छेद की व्यापक अभिव्यक्ति कमजोर वर्गों, विशेष रूप से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति है।

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अनुच्छेद 48 — कृषि, पशुपालन और गौ-संरक्षण

Article 48

अनुच्छेद 48 राज्य को कृषि और पशुपालन को आधुनिक एवं वैज्ञानिक आधार पर संगठित करने का प्रयास करने के लिए कहता है।

राज्य गायों, बछड़ों और अन्य दुधारू तथा भारवाहक पशुओं की नस्लों के संरक्षण और सुधार के लिए कदम उठाएगा तथा उनके वध को रोकने की दिशा में प्रयास करेगा।

इस अनुच्छेद में वैज्ञानिक कृषि का उदार-बौद्धिक पक्ष और पशु-संरक्षण का गांधीवादी पक्ष दोनों दिखाई देते हैं।

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अनुच्छेद 44 — समान नागरिक संहिता

Article 44

अनुच्छेद 44 राज्य को भारत के पूरे क्षेत्र में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता प्राप्त करने का प्रयास करने की दिशा देता है।

समान नागरिक संहिता स्वयं राज्य के नीति-निदेशक तत्वों का भाग है।

⚠️ भ्रम न करें

गलत: समान नागरिक संहिता राज्य के नीति-निदेशक तत्वों का भाग नहीं है।
सही: समान नागरिक संहिता = अनुच्छेद 44 = राज्य के नीति-निदेशक तत्व।

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अनुच्छेद 45 — बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा

Article 45

मूल संविधान में अनुच्छेद 45 राज्य को संविधान लागू होने के दस वर्ष के भीतर 14 वर्ष तक के बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराने की दिशा देता था।

86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 के बाद 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों की निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा को अनुच्छेद 21A के अंतर्गत मौलिक अधिकार बनाया गया।

इसके बाद अनुच्छेद 45 की विषय-वस्तु बदल दी गई। वर्तमान अनुच्छेद 45 राज्य को 6 वर्ष से कम आयु के सभी बच्चों के लिए प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा प्रदान करने का प्रयास करने के लिए कहता है।

🎯 सबसे महत्वपूर्ण अंतर

अनुच्छेद 21A → 6 से 14 वर्ष की निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा।
अनुच्छेद 45 → 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों की प्रारंभिक देखभाल और शिक्षा।

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अनुच्छेद 48A — पर्यावरण, वन और वन्यजीव

Article 48A

अनुच्छेद 48A राज्य को पर्यावरण की रक्षा और सुधार करने तथा देश के वनों और वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए प्रयास करने की दिशा देता है।

इसे 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा जोड़ा गया।

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अनुच्छेद 49 — राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों की रक्षा

Article 49

अनुच्छेद 49 राज्य को राष्ट्रीय महत्व घोषित किए गए स्मारकों, स्थानों और वस्तुओं की लूट, विनाश, विकृति या क्षति से रक्षा करने का कर्तव्य देता है।

यह प्रावधान भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण से संबंधित है।

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अनुच्छेद 50 — न्यायपालिका और कार्यपालिका का पृथक्करण

Article 50

अनुच्छेद 50 राज्य को अपनी लोक सेवाओं में न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करने के लिए कदम उठाने की दिशा देता है।

इसका उद्देश्य न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्ष न्याय व्यवस्था को मजबूत करना है।

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अनुच्छेद 51 — अंतरराष्ट्रीय शांति

Article 51

अनुच्छेद 51 राज्य को अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देने की दिशा देता है।

राज्य राष्ट्रों के बीच न्यायपूर्ण और सम्मानजनक संबंध बनाए रखने का प्रयास करेगा।

अंतरराष्ट्रीय कानून और संधि दायित्वों के प्रति सम्मान को बढ़ावा दिया जाएगा।

अंतरराष्ट्रीय विवादों को मध्यस्थता द्वारा सुलझाने के लिए प्रोत्साहन दिया जाएगा।

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समाजवादी तत्व — एक नज़र में

Socialistic Principles

अनुच्छेद मुख्य विषय
38सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय तथा असमानताओं को कम करना
39जीविका, संसाधनों का जनहित में वितरण, समान वेतन, शोषण की रोकथाम
39Aसमान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता
41काम, शिक्षा और सार्वजनिक सहायता
42मानवोचित कार्य दशाएँ और प्रसूति सहायता
43जीवन-निर्वाह योग्य मजदूरी और सम्मानजनक जीवन स्तर
43Aउद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी
47पोषण, जीवन स्तर और लोक स्वास्थ्य
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गांधीवादी तत्व — एक नज़र में

Gandhian Principles

अनुच्छेद मुख्य विषय
40ग्राम पंचायतों की स्थापना
43ग्रामीण कुटीर उद्योगों को बढ़ावा
46कमजोर वर्गों, विशेषकर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का हित
47मद्यनिषेध और लोक स्वास्थ्य
48पशुधन सुधार और गौ-संरक्षण
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उदार-बौद्धिक तत्व — एक नज़र में

Liberal-Intellectual Principles

अनुच्छेद मुख्य विषय
44समान नागरिक संहिता
456 वर्ष से कम आयु के बच्चों की प्रारंभिक देखभाल और शिक्षा
48वैज्ञानिक कृषि और पशुपालन
48Aपर्यावरण, वन और वन्यजीव संरक्षण
49राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों की रक्षा
50न्यायपालिका और कार्यपालिका का पृथक्करण
51अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा
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42वाँ संविधान संशोधन, 1976

42nd Amendment

42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा राज्य के नीति-निदेशक तत्वों में तीन अत्यंत महत्वपूर्ण प्रावधान जोड़े गए।

अनुच्छेद 39A — समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता।

अनुच्छेद 43A — उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी।

अनुच्छेद 48A — पर्यावरण, वन और वन्यजीव संरक्षण।

🧠 याद रखें

39A 43A 48A
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44वाँ संविधान संशोधन, 1978

44th Amendment

44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा अनुच्छेद 38 में खंड (2) जोड़ा गया।

इसके द्वारा राज्य को आय, प्रतिष्ठा, सुविधाओं और अवसरों में मौजूद असमानताओं को कम करने के लिए प्रयास करने की दिशा दी गई।

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86वाँ संविधान संशोधन, 2002

86th Amendment

86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा अनुच्छेद 21A जोड़ा गया और 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों की निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया गया।

अनुच्छेद 45 को संशोधित करके 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों की प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा से संबंधित किया गया।

इसी संशोधन द्वारा अनुच्छेद 51A(k) में माता-पिता या अभिभावक का यह कर्तव्य जोड़ा गया कि वे 6 से 14 वर्ष के बच्चे को शिक्षा का अवसर प्रदान करें।

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मौलिक अधिकार और नीति-निदेशक तत्व

Fundamental Rights & DPSP

आधार मौलिक अधिकार नीति-निदेशक तत्व
संवैधानिक भाग भाग III भाग IV
न्यायालय में प्रवर्तन प्रवर्तनीय सीधे प्रवर्तनीय नहीं
मुख्य उद्देश्य व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अधिकारों की रक्षा सामाजिक और आर्थिक कल्याण की दिशा
व्यापक लक्ष्य राजनीतिक लोकतंत्र सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र

📗 सही समझ

मौलिक अधिकार और नीति-निदेशक तत्व विरोधी नहीं हैं। दोनों मिलकर संविधान के व्यापक सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक लक्ष्यों को पूरा करने का प्रयास करते हैं।

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अनुच्छेद 31C

Article 31C

मौलिक अधिकारों और नीति-निदेशक तत्वों के संबंध में अनुच्छेद 31C महत्वपूर्ण है।

25वें संविधान संशोधन द्वारा मूल रूप से अनुच्छेद 39(b) और 39(c) को लागू करने वाले कुछ कानूनों को विशेष संवैधानिक संरक्षण प्रदान किया गया।

42वें संविधान संशोधन ने इस संरक्षण को सभी नीति-निदेशक तत्वों तक विस्तारित करने का प्रयास किया।

बाद में मिनर्वा मिल्स मामले में इस व्यापक विस्तार को असंवैधानिक घोषित किया गया।

31

केशवानंद भारती मामला, 1973

Kesavananda Bharati Case

केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य, 1973 में उच्चतम न्यायालय ने प्रसिद्ध मूल संरचना सिद्धांत प्रतिपादित किया।

न्यायालय ने माना कि संसद संविधान में संशोधन कर सकती है, लेकिन संविधान की मूल संरचना को नष्ट नहीं कर सकती।

इस निर्णय में मौलिक अधिकारों और नीति-निदेशक तत्वों के संवैधानिक संबंध पर भी महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए गए।

यह कहना कि इस मामले में सभी नीति-निदेशक तत्वों को सीधे मूल संरचना घोषित कर दिया गया, अत्यधिक सरलीकरण होगा।

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मिनर्वा मिल्स मामला, 1980

Minerva Mills Case

मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ, 1980 में उच्चतम न्यायालय ने मौलिक अधिकारों और नीति-निदेशक तत्वों के बीच सामंजस्य और संतुलन को अत्यंत महत्वपूर्ण माना।

संविधान केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता या केवल सामाजिक-आर्थिक लक्ष्यों में से किसी एक को पूर्ण प्रधानता नहीं देता। दोनों के बीच संतुलन आवश्यक है।

इसी कारण परीक्षा में मौलिक अधिकार और नीति-निदेशक तत्वों को एक-दूसरे के पूरक के रूप में पढ़ना अधिक उचित है।

🎯 परीक्षा-सुरक्षित तथ्य

मिनर्वा मिल्स, 1980 → मौलिक अधिकार और नीति-निदेशक तत्वों के बीच सामंजस्य एवं संतुलन।

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पर्यावरण संरक्षण और 1996 का महत्वपूर्ण मामला

Environmental Jurisprudence

पर्यावरण संरक्षण से संबंधित 1996 का महत्वपूर्ण उच्चतम न्यायालय मामला वेल्लोर सिटिजन्स वेलफेयर फोरम बनाम भारत संघ है।

इस मामले में पर्यावरण संरक्षण, सतत विकास, सावधानी सिद्धांत और प्रदूषक-भुगतान सिद्धांत जैसे महत्वपूर्ण पर्यावरणीय सिद्धांतों को बल मिला।

इसे अनुच्छेद 48A तथा पर्यावरण संबंधी संवैधानिक दायित्वों के अध्ययन में महत्वपूर्ण माना जाता है।

⚠️ नाम याद रखें

भ्रमित नाम: “गोविंद वर्मा मामला, 1996”।
परीक्षा के लिए सुरक्षित: वेल्लोर सिटिजन्स वेलफेयर फोरम बनाम भारत संघ, 1996।

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के. टी. शाह का प्रसिद्ध कथन

K. T. Shah

राज्य के नीति-निदेशक तत्वों की गैर-न्यायोचित प्रकृति की आलोचना करते हुए के. टी. शाह से यह प्रसिद्ध विचार जोड़ा जाता है कि ये ऐसे चेक के समान हैं जिनका भुगतान बैंक की सुविधानुसार किया जाता है।

इस कथन का आशय यह है कि इन सिद्धांतों का लागू होना तत्काल न्यायिक आदेश के बजाय सरकार की नीतियों, संसाधनों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

यह संविधान का कोई प्रावधान नहीं, बल्कि नीति-निदेशक तत्वों की प्रकृति पर किया गया आलोचनात्मक कथन है।

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महत्वपूर्ण भ्रम और सही तथ्य

Common Mistakes & Corrections

गलत: नीति-निदेशक तत्व केवल सरकार के सुझाव हैं।
सही: ये न्यायालय द्वारा सीधे प्रवर्तनीय नहीं हैं, लेकिन संविधान इन्हें शासन में मूलभूत मानता है।

गलत: संविधान स्वयं DPSP को समाजवादी, गांधीवादी और उदारवादी वर्गों में बाँटता है।
सही: यह अध्ययन की सुविधा के लिए किया गया वर्गीकरण है।

गलत: अनुच्छेद 45 में आज भी 6 से 14 वर्ष की शिक्षा का प्रावधान है।
सही: 6–14 वर्ष की शिक्षा अनुच्छेद 21A में मौलिक अधिकार है; वर्तमान अनुच्छेद 45 छह वर्ष से कम बच्चों की प्रारंभिक देखभाल और शिक्षा से संबंधित है।

गलत: समान नागरिक संहिता नीति-निदेशक तत्वों का भाग नहीं है।
सही: समान नागरिक संहिता अनुच्छेद 44 में नीति-निदेशक तत्व है।

अति-सरलीकरण: अनुच्छेद 41 प्रत्येक व्यक्ति को रोजगार का मौलिक अधिकार देता है।
सही: राज्य अपनी आर्थिक क्षमता और विकास की सीमाओं के भीतर काम, शिक्षा और सार्वजनिक सहायता की व्यवस्था का प्रयास करेगा।

अति-सरलीकरण: केशवानंद भारती मामले में सभी DPSP को मूल संरचना घोषित किया गया।
सही: इस मामले ने मूल संरचना सिद्धांत स्थापित किया और मौलिक अधिकार तथा नीति-निदेशक तत्वों के संबंध पर महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए।

गलत/भ्रमित: “गोविंद वर्मा मामला, 1996” अनुच्छेद 48A का प्रमुख मामला है।
सही: 1996 का महत्वपूर्ण पर्यावरण मामला वेल्लोर सिटिजन्स वेलफेयर फोरम बनाम भारत संघ है।

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अनुच्छेदों का त्वरित क्रम

Article-wise Quick Recall

अनुच्छेद विषय
36राज्य की परिभाषा
37प्रवर्तनीय नहीं, फिर भी शासन में मूलभूत
38सामाजिक व्यवस्था और न्याय
39राज्य की नीति के प्रमुख सिद्धांत
39Aसमान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता
40ग्राम पंचायत
41काम, शिक्षा और सार्वजनिक सहायता
42मानवोचित कार्य दशाएँ और प्रसूति सहायता
43जीवन-निर्वाह योग्य मजदूरी और कुटीर उद्योग
43Aउद्योगों में श्रमिक भागीदारी
43Bसहकारी समितियाँ
44समान नागरिक संहिता
456 वर्ष से कम बच्चों की प्रारंभिक देखभाल और शिक्षा
46कमजोर वर्गों का शैक्षिक और आर्थिक हित
47पोषण, लोक स्वास्थ्य और मद्यनिषेध
48कृषि, पशुपालन और पशु-संरक्षण
48Aपर्यावरण, वन और वन्यजीव
49राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों की रक्षा
50न्यायपालिका-कार्यपालिका पृथक्करण
51अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा
37

त्वरित पुनरावृत्ति

Quick Revision

⚡ मुख्य अनुच्छेद

38—सामाजिक न्याय 39—आर्थिक नीति 39A—निःशुल्क विधिक सहायता 40—पंचायत
44—समान नागरिक संहिता 45—6 वर्ष से कम बच्चे 48A—पर्यावरण 50—न्यायपालिका पृथक्करण 51—अंतरराष्ट्रीय शांति

⚡ अंतिम पुनरावृत्ति

राज्य के नीति-निदेशक तत्व — संविधान के भाग IV, अनुच्छेद 36 से 51।

प्रेरणा — आयरलैंड का संविधान।

अनुच्छेद 37 — न्यायालय द्वारा सीधे प्रवर्तनीय नहीं, लेकिन शासन में मूलभूत।

मुख्य उद्देश्य — सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र तथा लोक-कल्याणकारी राज्य की स्थापना।

सामान्य अध्ययन-वर्गीकरण — समाजवादी, गांधीवादी और उदार-बौद्धिक।

अनुच्छेद 38 — सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय।

अनुच्छेद 39 — जीविका, संसाधनों का जनहित में वितरण, धन का संकेंद्रण रोकना, समान कार्य का समान वेतन और शोषण से सुरक्षा।

अनुच्छेद 39A — समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता।

अनुच्छेद 40 — ग्राम पंचायत।

अनुच्छेद 41 — आर्थिक क्षमता की सीमा में काम, शिक्षा और सार्वजनिक सहायता।

अनुच्छेद 42 — मानवोचित कार्य दशाएँ और प्रसूति सहायता।

अनुच्छेद 43 — जीवन-निर्वाह योग्य मजदूरी और कुटीर उद्योग।

अनुच्छेद 43A — उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिक भागीदारी।

अनुच्छेद 43B — सहकारी समितियों को बढ़ावा।

अनुच्छेद 44 — समान नागरिक संहिता।

अनुच्छेद 45 — 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों की प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा।

अनुच्छेद 21A — 6 से 14 वर्ष के बच्चों की निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का मौलिक अधिकार।

अनुच्छेद 46 — कमजोर वर्गों, विशेषकर अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों का शैक्षिक एवं आर्थिक हित।

अनुच्छेद 47 — पोषण, लोक स्वास्थ्य और मद्यनिषेध।

अनुच्छेद 48 — वैज्ञानिक कृषि, पशुपालन और पशु-संरक्षण।

अनुच्छेद 48A — पर्यावरण, वन और वन्यजीव संरक्षण।

अनुच्छेद 49 — राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों की रक्षा।

अनुच्छेद 50 — न्यायपालिका और कार्यपालिका का पृथक्करण।

अनुच्छेद 51 — अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा।

42वाँ संशोधन, 1976 — 39A, 43A और 48A जोड़े गए।

44वाँ संशोधन, 1978 — अनुच्छेद 38 में असमानताओं को कम करने संबंधी प्रावधान का विस्तार।

86वाँ संशोधन, 2002 — अनुच्छेद 21A जोड़ा गया और अनुच्छेद 45 बदला गया।

97वाँ संशोधन, 2011 — अनुच्छेद 43B जोड़ा गया।

केशवानंद भारती, 1973 — मूल संरचना सिद्धांत।

मिनर्वा मिल्स, 1980 — मौलिक अधिकार और नीति-निदेशक तत्वों के बीच सामंजस्य और संतुलन।

वेल्लोर सिटिजन्स वेलफेयर फोरम, 1996 — पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास से संबंधित महत्वपूर्ण मामला।

के. टी. शाह — नीति-निदेशक तत्वों की गैर-न्यायोचित प्रकृति से संबंधित प्रसिद्ध “चेक” वाला आलोचनात्मक कथन।

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