राष्ट्रीय आय
भारत में राष्ट्रीय आय का इतिहास, प्रमुख अवधारणाएँ और गणना की विधियाँ
राष्ट्रीय आय क्या है?
किसी अर्थव्यवस्था की आर्थिक गतिविधियों और उत्पादन को मापने के लिए राष्ट्रीय आय से संबंधित विभिन्न मापों का प्रयोग किया जाता है। सकल घरेलू उत्पाद, शुद्ध घरेलू उत्पाद, सकल राष्ट्रीय आय तथा शुद्ध राष्ट्रीय आय जैसी अवधारणाएँ यह समझने में सहायता करती हैं कि देश में कितना उत्पादन हुआ, उससे कितनी आय प्राप्त हुई और पूँजी के घिसाव के बाद वास्तविक शुद्ध उत्पादन कितना बचा।
भारत में राष्ट्रीय आय के अनुमान का इतिहास
भारत में राष्ट्रीय आय का पहला महत्वपूर्ण अनुमान दादाभाई नौरोजी ने लगाया था। उन्होंने 1867-68 के आसपास भारत की राष्ट्रीय आय का अनुमान प्रस्तुत किया। उनके आर्थिक विचारों और भारत की गरीबी के विश्लेषण का विस्तृत वर्णन बाद में उनकी प्रसिद्ध पुस्तक “पावर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया” में प्रकाशित हुआ।
दादाभाई नौरोजी ने ब्रिटिश शासन के दौरान भारत से धन के बाहर जाने की प्रक्रिया को धन-निष्कासन सिद्धांत के माध्यम से समझाया। इसलिए उन्हें भारत में राष्ट्रीय आय के प्रारंभिक आकलन से भी जोड़ा जाता है।
स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रीय आय के व्यवस्थित और वैज्ञानिक अनुमान के लिए 1949 में राष्ट्रीय आय समिति का गठन किया गया। इस समिति के अध्यक्ष प्रो. पी. सी. महालनोबिस थे।
इस समिति के अन्य प्रमुख सदस्यों में डी. आर. गाडगिल और वी. के. आर. वी. राव शामिल थे। समिति ने भारत में राष्ट्रीय आय के अनुमान की पद्धति को व्यवस्थित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
🎯 परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण
भारत में राष्ट्रीय आय के प्रारंभिक अनुमान से दादाभाई नौरोजी जुड़े हैं, जबकि स्वतंत्र भारत में राष्ट्रीय आय समिति — 1949 — अध्यक्ष पी. सी. महालनोबिस याद रखें।
केंद्रीय सांख्यिकी संगठन
केंद्रीय सांख्यिकी संगठन भारत सरकार की सांख्यिकीय व्यवस्था का एक प्रमुख संगठन था। इसकी स्थापना 1951 में की गई थी।
इसका प्रमुख कार्य राष्ट्रीय आय, राष्ट्रीय लेखा तथा देश की विभिन्न आर्थिक गतिविधियों से संबंधित सांख्यिकीय आँकड़ों का संकलन और विश्लेषण करना था।
लंबे समय तक भारत में राष्ट्रीय आय और सकल घरेलू उत्पाद से संबंधित आधिकारिक अनुमान जारी करने में केंद्रीय सांख्यिकी संगठन की प्रमुख भूमिका रही।
वर्तमान व्यवस्था में केंद्रीय सांख्यिकी संगठन एक अलग स्वतंत्र संस्था के रूप में राष्ट्रीय आय का अनुमान नहीं लगाता, क्योंकि इसे राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय के साथ मिलाकर राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के अंतर्गत संगठित कर दिया गया है।
राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण
राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण की शुरुआत 1950 में की गई थी। इसका उद्देश्य देश की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के बारे में बड़े पैमाने पर नमूना सर्वेक्षण करना था।
इसके माध्यम से उपभोग, रोजगार, बेरोजगारी, उद्योग, सेवा क्षेत्र, असंगठित क्षेत्र तथा परिवारों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति से संबंधित महत्वपूर्ण आँकड़े एकत्र किए जाते रहे।
विशेष रूप से अर्थव्यवस्था के ऐसे क्षेत्रों के बारे में जानकारी जुटाने में इसका महत्वपूर्ण योगदान रहा जहाँ नियमित प्रशासनिक आँकड़े उपलब्ध नहीं होते थे।
ये सर्वेक्षण राष्ट्रीय आय के अनुमान, आर्थिक योजना तथा सरकारी नीति निर्माण के लिए महत्वपूर्ण सांख्यिकीय आधार प्रदान करते हैं।
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय
केंद्र सरकार ने मई 2019 में केंद्रीय सांख्यिकी संगठन और राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय की सांख्यिकीय गतिविधियों को पुनर्गठित कर राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के अंतर्गत एकीकृत किया।
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय, सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के अधीन कार्य करता है।
वर्तमान में भारत के सकल घरेलू उत्पाद, राष्ट्रीय आय, राष्ट्रीय लेखा और अनेक प्रमुख आधिकारिक आर्थिक आँकड़ों के संकलन तथा प्रकाशन का कार्य राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा किया जाता है।
📗 याद रखें
केंद्रीय सांख्यिकी संगठन + राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय → राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय
भारतीय अर्थव्यवस्था में क्षेत्रों का योगदान
भारत की अर्थव्यवस्था में सेवा क्षेत्र का योगदान सबसे अधिक है। इसके बाद सामान्यतः उद्योग क्षेत्र और फिर कृषि एवं संबद्ध क्षेत्र का स्थान आता है।
अलग-अलग वर्षों में इन क्षेत्रों का प्रतिशत बदलता रहता है। सामान्य अध्ययन में सेवा क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग आधे से अधिक अर्थव्यवस्था के आसपास रहती है, जबकि उद्योग की हिस्सेदारी लगभग एक-चौथाई से अधिक और कृषि की हिस्सेदारी इससे कम रहती है।
इसलिए सेवा 55–60%, उद्योग 25–30% और कृषि 15–20% जैसे आँकड़ों को स्थायी प्रतिशत नहीं मानना चाहिए। परीक्षा में यदि किसी विशेष वर्ष का प्रश्न हो तो उसी वर्ष के आधिकारिक आँकड़े को आधार मानना चाहिए।
🎯 मुख्य क्रम
सकल घरेलू उत्पाद
सकल घरेलू उत्पाद से आशय किसी देश की घरेलू आर्थिक सीमा के भीतर एक निश्चित अवधि, सामान्यतः एक वर्ष, में उत्पादित अंतिम वस्तुओं और सेवाओं के कुल मौद्रिक मूल्य से है।
इसमें उत्पादन कहाँ हुआ है, यह महत्वपूर्ण होता है। उत्पादन करने वाली इकाई भारतीय हो या विदेशी, यदि उत्पादन भारत की घरेलू सीमा के भीतर हुआ है तो वह भारत के सकल घरेलू उत्पाद का हिस्सा हो सकता है।
सकल घरेलू उत्पाद में किसी वस्तु के उत्पादन के प्रत्येक चरण का पूरा मूल्य अलग-अलग नहीं जोड़ा जाता, क्योंकि ऐसा करने से दोहरी गणना हो जाएगी। इसलिए अंतिम वस्तुओं का मूल्य या प्रत्येक चरण पर उत्पन्न मूल्य-वर्धन को शामिल किया जाता है।
उदाहरण के लिए यदि गेहूँ से आटा और फिर आटे से ब्रेड बनाई जाती है, तो अंतिम वस्तु पद्धति में सकल घरेलू उत्पाद में ब्रेड का अंतिम मूल्य शामिल किया जाएगा। गेहूँ, आटा और ब्रेड की पूरी कीमत को अलग-अलग जोड़ना गलत होगा।
💡 घरेलू और राष्ट्रीय में अंतर
घरेलू शब्द उत्पादन के स्थान को बताता है, जबकि राष्ट्रीय अवधारणा में देश के सामान्य निवासियों की आर्थिक आय महत्वपूर्ण होती है।
नाममात्र और वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद
नाममात्र सकल घरेलू उत्पाद
नाममात्र सकल घरेलू उत्पाद में वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन का मूल्य चालू वर्ष की वर्तमान कीमतों पर मापा जाता है।
इसमें कीमतों में हुई वृद्धि अर्थात मुद्रास्फीति का प्रभाव भी शामिल रहता है। इसलिए नाममात्र सकल घरेलू उत्पाद बढ़ने का अर्थ हमेशा वास्तविक उत्पादन में उतनी ही वृद्धि होना नहीं है।
वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद
वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद में उत्पादन का मूल्य एक निश्चित आधार वर्ष की कीमतों पर मापा जाता है।
इससे कीमतों में परिवर्तन के प्रभाव को अलग करके वस्तुओं और सेवाओं के वास्तविक उत्पादन में हुई वृद्धि को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है।
भारत की नई राष्ट्रीय लेखा श्रृंखला में सकल घरेलू उत्पाद का आधार वर्ष 2022–23 है। इस नई श्रृंखला को फरवरी 2026 में जारी किया गया।
🎯 आसान अंतर
नाममात्र = चालू कीमतें
वास्तविक = आधार वर्ष की स्थिर कीमतें
कारक लागत, मूल कीमत और बाजार कीमत
पुराने राष्ट्रीय आय लेखांकन और अनेक प्रतियोगी परीक्षाओं की पुस्तकों में कारक लागत पर सकल घरेलू उत्पाद का व्यापक प्रयोग मिलता है। कारक लागत उत्पादन के कारकों को प्राप्त होने वाले भुगतान से संबंधित अवधारणा है।
वर्तमान भारतीय राष्ट्रीय लेखा प्रणाली में उत्पादन पक्ष पर मूल कीमत पर सकल मूल्य वर्धन तथा समग्र अर्थव्यवस्था के लिए बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद प्रमुख माप हैं।
बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद प्राप्त करने के लिए मूल कीमत पर सकल मूल्य वर्धन में उत्पादों पर कर जोड़े जाते हैं और उत्पादों पर सब्सिडी घटाई जाती है।
⚠️ परीक्षा-सावधानी
पुराने प्रश्नों में कारक लागत पर सकल घरेलू उत्पाद पूछा जा सकता है, जबकि वर्तमान आधिकारिक राष्ट्रीय लेखांकन में मूल कीमत पर सकल मूल्य वर्धन और बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद अधिक महत्वपूर्ण हैं।
शुद्ध घरेलू उत्पाद
शुद्ध घरेलू उत्पाद वह मूल्य है जो सकल घरेलू उत्पाद में से एक निश्चित अवधि में पूँजीगत संपत्तियों के मूल्यह्रास को घटाने के बाद प्राप्त होता है।
सकल घरेलू उत्पाद देश के भीतर एक वर्ष में उत्पादित अंतिम वस्तुओं और सेवाओं के कुल मूल्य को दर्शाता है। लेकिन उत्पादन के दौरान मशीनें, उपकरण, भवन तथा अन्य स्थायी पूँजीगत संपत्तियाँ धीरे-धीरे घिसती हैं।
मशीनों, भवनों और उपकरणों के इस घिसाव या उनकी उपयोगी आर्थिक कीमत में कमी को मूल्यह्रास अथवा स्थायी पूँजी उपभोग कहा जाता है।
सकल घरेलू उत्पाद में से इस मूल्यह्रास को घटाने पर बचा हुआ शुद्ध उत्पादन शुद्ध घरेलू उत्पाद कहलाता है।
💡 सरल उदाहरण
यदि सकल घरेलू उत्पाद ₹500 लाख है और वर्ष के दौरान पूँजीगत संपत्तियों का मूल्यह्रास ₹40 लाख है, तो शुद्ध घरेलू उत्पाद ₹460 लाख होगा।
शुद्ध घरेलू उत्पाद के मूल्यांकन
शुद्ध घरेलू उत्पाद को भी विभिन्न मूल्य अवधारणाओं पर व्यक्त किया जा सकता है। बाजार कीमत पर शुद्ध घरेलू उत्पाद बाजार में प्रचलित कीमतों के आधार पर मापा जाता है।
पुरानी राष्ट्रीय आय पद्धति में कारक लागत पर शुद्ध घरेलू उत्पाद की अवधारणा भी प्रयोग की जाती थी।
इसे उपभोक्ता मूल्य सूचकांक से कर हटाकर प्राप्त उत्पाद नहीं कहा जाता। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक मुख्यतः उपभोक्ताओं द्वारा खरीदी जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में परिवर्तन मापने का सूचकांक है; यह शुद्ध घरेलू उत्पाद के प्रकार की परिभाषा नहीं है।
⚠️ भ्रम से बचें
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक और शुद्ध घरेलू उत्पाद दो अलग आर्थिक अवधारणाएँ हैं। इन्हें एक-दूसरे की गणना की परिभाषा न समझें।
सकल राष्ट्रीय उत्पाद
सकल राष्ट्रीय उत्पाद पारंपरिक राष्ट्रीय आय अवधारणा है। आधुनिक राष्ट्रीय लेखांकन में इसके निकट संबंधित अवधारणा सकल राष्ट्रीय आय है।
इसका उद्देश्य देश की घरेलू सीमा से आगे बढ़कर देश के सामान्य निवासियों द्वारा अर्जित आय को ध्यान में रखना है।
इसमें देश के सामान्य निवासियों को विदेश से प्राप्त कारक आय जोड़ी जाती है और देश की घरेलू अर्थव्यवस्था से गैर-निवासियों को जाने वाली कारक आय घटाई जाती है।
सामान्य भाषा में इसे इस प्रकार समझा जा सकता है कि देश के निवासियों और निवासी संस्थाओं की देश तथा विदेश से प्राप्त संबंधित आय को राष्ट्रीय अवधारणा में ध्यान में रखा जाता है।
केवल नागरिकता इसका सही आधार नहीं है। राष्ट्रीय लेखांकन में आर्थिक निवास की अवधारणा अधिक महत्वपूर्ण होती है।
सकल राष्ट्रीय उत्पाद का उदाहरण
यदि भारत की कोई निवासी कंपनी अमेरिका में आर्थिक गतिविधि से ऐसी आय अर्जित करती है जो राष्ट्रीय लेखांकन में भारत के निवासियों की विदेश से प्राप्त कारक आय मानी जाती है, तो वह भारत की राष्ट्रीय आय की गणना में जोड़ी जा सकती है।
इसी प्रकार यदि कोई विदेशी निवासी इकाई भारत में उत्पादन करके आय अर्जित करती है और वह आय विदेश को जाती है, तो राष्ट्रीय अवधारणा तक पहुँचने के लिए उसे घरेलू आय से समायोजित किया जाता है।
🎯 सबसे आसान नियम
सकल घरेलू उत्पाद = देश की सीमा के भीतर उत्पादन
सकल राष्ट्रीय आय = देश के सामान्य निवासियों से संबंधित आय
शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद
शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद प्राप्त करने के लिए सकल राष्ट्रीय उत्पाद में से मूल्यह्रास घटाया जाता है।
सकल राष्ट्रीय उत्पाद एक वर्ष में राष्ट्रीय आधार पर प्राप्त सकल उत्पादन अथवा आय को दर्शाता है, जबकि शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद पूँजीगत संपत्तियों के घिसाव को घटाने के बाद बची शुद्ध मात्रा को दर्शाता है।
मूल्यह्रास मशीनों, उपकरणों, भवनों तथा अन्य पूँजीगत संपत्तियों के प्रयोग से उनकी आर्थिक कीमत या उपयोगी क्षमता में होने वाली कमी को दर्शाता है।
इस प्रकार शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद में पूँजीगत वस्तुओं के घिसने-पिटने का समायोजन हो जाता है।
💡 उदाहरण
यदि किसी देश का सकल राष्ट्रीय उत्पाद ₹100 लाख है और मूल्यह्रास ₹10 लाख है, तो शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद:
राष्ट्रीय आय की पारंपरिक परीक्षा अवधारणा
प्रतियोगी परीक्षाओं की पारंपरिक अर्थशास्त्रीय भाषा में कारक लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद को राष्ट्रीय आय कहा जाता है।
आधुनिक राष्ट्रीय लेखांकन में शुद्ध राष्ट्रीय आय शब्द का प्रयोग किया जाता है। इसलिए पुराने प्रश्नों और वर्तमान आधिकारिक आँकड़ों की शब्दावली में अंतर समझना महत्वपूर्ण है।
राष्ट्रीय आय को केवल “देश की सीमा के भीतर उत्पन्न कुल वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य” कहना सही नहीं है, क्योंकि वह परिभाषा सकल घरेलू उत्पाद के अधिक निकट है।
🎯 पुरानी परीक्षा पुस्तकों का महत्वपूर्ण सूत्र
राष्ट्रीय आय = कारक लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद
राष्ट्रीय आय की अवधारणाओं का संबंध
🧠 सूत्रों का आसान क्रम
| अवधारणा | सरल अर्थ | मुख्य सूत्र |
|---|---|---|
| सकल घरेलू उत्पाद | देश की घरेलू सीमा के भीतर सकल उत्पादन | घरेलू अंतिम उत्पादन का कुल मूल्य |
| शुद्ध घरेलू उत्पाद | मूल्यह्रास घटाने के बाद घरेलू उत्पादन | सकल घरेलू उत्पाद − मूल्यह्रास |
| सकल राष्ट्रीय उत्पाद | विदेश से शुद्ध कारक आय समायोजित करने के बाद राष्ट्रीय सकल मात्रा | सकल घरेलू उत्पाद + विदेश से शुद्ध कारक आय |
| शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद | राष्ट्रीय सकल मात्रा में से मूल्यह्रास घटाने के बाद | सकल राष्ट्रीय उत्पाद − मूल्यह्रास |
राष्ट्रीय आय की गणना
राष्ट्रीय आय और राष्ट्रीय उत्पादन के आकलन के लिए अर्थव्यवस्था की गतिविधियों को अलग-अलग दृष्टिकोण से मापा जा सकता है। सामान्यतः इसकी गणना की तीन प्रमुख विधियाँ बताई जाती हैं—उत्पादन विधि, आय विधि और व्यय विधि।
सिद्धांततः सही आँकड़ों और समान लेखांकन सीमा का उपयोग करने पर तीनों विधियाँ अर्थव्यवस्था की उसी आर्थिक गतिविधि को अलग-अलग दृष्टिकोण से मापती हैं।
उत्पादन विधि
उत्पादन विधि में अर्थव्यवस्था के विभिन्न उत्पादन क्षेत्रों द्वारा एक निश्चित अवधि में उत्पन्न वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य-वर्धन का आकलन किया जाता है।
केवल सभी वस्तुओं का सकल बिक्री मूल्य जोड़ देना सही नहीं होगा, क्योंकि मध्यवर्ती वस्तुओं को कई बार गिने जाने से दोहरी गणना हो सकती है।
इसलिए प्रत्येक उत्पादन इकाई के कुल उत्पादन मूल्य में से उत्पादन में प्रयुक्त मध्यवर्ती वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य घटाकर मूल्य-वर्धन प्राप्त किया जाता है।
🎯 मुख्य बात
उत्पादन विधि का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य दोहरी गणना से बचना है।
आय विधि
आय विधि में उत्पादन प्रक्रिया से उत्पन्न विभिन्न प्रकार की आय को जोड़ा जाता है।
पारंपरिक सरल रूप में उत्पादन के कारकों को प्राप्त मजदूरी, किराया, ब्याज और लाभ को जोड़कर आय का आकलन समझाया जाता है।
वास्तविक राष्ट्रीय लेखांकन में कर्मचारियों का पारिश्रमिक, परिचालन अधिशेष, मिश्रित आय तथा संबंधित अन्य समायोजनों का अधिक विस्तृत वर्गीकरण किया जाता है।
व्यय विधि
व्यय विधि में अर्थव्यवस्था में अंतिम वस्तुओं और सेवाओं पर किए गए कुल अंतिम व्यय को जोड़ा जाता है।
इसके प्रमुख भागों में घरेलू उपभोग व्यय, निवेश व्यय, सरकारी अंतिम उपभोग व्यय तथा शुद्ध निर्यात शामिल होते हैं।
शुद्ध निर्यात प्राप्त करने के लिए निर्यात में से आयात घटाया जाता है।
📗 याद रखने का तरीका
तीनों गणना विधियों में अंतर
| विधि | क्या मापा जाता है? | मुख्य आधार |
|---|---|---|
| उत्पादन विधि | उत्पादन से उत्पन्न मूल्य-वर्धन | उत्पादन − मध्यवर्ती उपभोग |
| आय विधि | उत्पादन से अर्जित आय | मजदूरी, किराया, ब्याज, लाभ आदि |
| व्यय विधि | अंतिम वस्तुओं और सेवाओं पर व्यय | उपभोग + निवेश + सरकारी व्यय + शुद्ध निर्यात |
🎯 एक लाइन में याद करें
उत्पादन विधि = क्या बना?
आय विधि = कितनी आय मिली?
व्यय विधि = कितना अंतिम खर्च हुआ?
मध्यवर्ती और अंतिम वस्तु
मध्यवर्ती वस्तु वह वस्तु है जिसका उपयोग किसी दूसरी वस्तु या सेवा के उत्पादन में किया जाता है।
अंतिम वस्तु वह वस्तु है जो अंतिम उपयोग के लिए खरीदी जाती है और वर्तमान उत्पादन प्रक्रिया में आगे पुनः प्रसंस्करण के लिए नहीं खरीदी जाती।
किसी वस्तु का मध्यवर्ती या अंतिम होना केवल उसके प्रकार पर निर्भर नहीं करता, बल्कि इस बात पर निर्भर करता है कि उसका उपयोग किस उद्देश्य से किया जा रहा है।
उदाहरण के लिए किसी बेकरी द्वारा ब्रेड बनाने के लिए खरीदा गया आटा मध्यवर्ती वस्तु है, जबकि किसी परिवार द्वारा घर में उपयोग के लिए खरीदा गया वही आटा अंतिम वस्तु हो सकता है।
सकल और शुद्ध का अंतर
🧠 सबसे आसान नियम
जब किसी आर्थिक माप में मूल्यह्रास शामिल रहता है तो वह सामान्यतः सकल अवधारणा होती है।
उसी सकल मात्रा में से मूल्यह्रास घटा देने पर शुद्ध मात्रा प्राप्त होती है।
यही नियम सकल घरेलू उत्पाद से शुद्ध घरेलू उत्पाद तथा सकल राष्ट्रीय उत्पाद से शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद प्राप्त करने में लागू होता है।
घरेलू और राष्ट्रीय का अंतर
| आधार | घरेलू अवधारणा | राष्ट्रीय अवधारणा |
|---|---|---|
| मुख्य आधार | देश की घरेलू आर्थिक सीमा | देश के सामान्य निवासी |
| विदेश से आय | सीधे शामिल नहीं | निवासियों की संबंधित विदेश आय का समायोजन |
| विदेशियों की घरेलू आय | घरेलू उत्पादन में शामिल हो सकती है | राष्ट्रीय आय तक पहुँचने में समायोजित की जाती है |
महत्वपूर्ण भ्रम और सही अवधारणा
भ्रम: राष्ट्रीय आय का अर्थ केवल देश की सीमा के अंदर उत्पादन है।
सही: देश की सीमा के भीतर उत्पादन मुख्यतः घरेलू उत्पाद की अवधारणा है; राष्ट्रीय अवधारणा में निवासियों से संबंधित आय का भी समायोजन होता है।
भ्रम: सकल घरेलू उत्पाद में गेहूँ, आटा और ब्रेड तीनों की पूरी कीमत जोड़ दी जाती है।
सही: ऐसा करने पर दोहरी गणना होगी। अंतिम उत्पाद या प्रत्येक चरण के मूल्य-वर्धन की गणना की जाती है।
भ्रम: वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद वर्तमान कीमतों पर मापा जाता है।
सही: वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद आधार वर्ष की स्थिर कीमतों पर मापा जाता है।
भ्रम: नाममात्र सकल घरेलू उत्पाद से मुद्रास्फीति का प्रभाव पूरी तरह हट जाता है।
सही: नाममात्र सकल घरेलू उत्पाद में वर्तमान कीमतों का प्रभाव शामिल रहता है।
भ्रम: शुद्ध घरेलू उत्पाद का प्रकार उपभोक्ता मूल्य सूचकांक से कर हटाकर प्राप्त होता है।
सही: उपभोक्ता मूल्य सूचकांक कीमतों में परिवर्तन का अलग सूचकांक है। शुद्ध घरेलू उत्पाद सकल घरेलू उत्पाद में से मूल्यह्रास घटाने पर प्राप्त होता है।
भ्रम: सकल राष्ट्रीय उत्पाद का आधार केवल नागरिकता है।
सही: राष्ट्रीय लेखांकन में सामान्य निवास की अवधारणा महत्वपूर्ण होती है।
भ्रम: सेवा, उद्योग और कृषि की हिस्सेदारी हमेशा निश्चित प्रतिशत रहती है।
सही: इन क्षेत्रों की हिस्सेदारी प्रत्येक वर्ष बदल सकती है।
त्वरित पुनरावृत्ति
⚡ एक नज़र में
⚡ अंतिम पुनरावृत्ति बिंदु
भारत में राष्ट्रीय आय के प्रारंभिक अनुमान से दादाभाई नौरोजी का नाम जुड़ा है।
स्वतंत्र भारत में 1949 में राष्ट्रीय आय समिति का गठन किया गया और पी. सी. महालनोबिस इसके अध्यक्ष थे।
राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण की शुरुआत 1950 तथा केंद्रीय सांख्यिकी संगठन की स्थापना 1951 में हुई।
केंद्रीय सांख्यिकी संगठन और राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय की सांख्यिकीय गतिविधियों को 2019 में राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के अंतर्गत एकीकृत किया गया।
भारत की वर्तमान राष्ट्रीय लेखा श्रृंखला का आधार वर्ष 2022–23 है।
भारत की अर्थव्यवस्था में सामान्यतः सेवा क्षेत्र का योगदान सबसे अधिक रहता है।
सकल घरेलू उत्पाद देश की घरेलू आर्थिक सीमा के भीतर अंतिम उत्पादन को मापता है।
नाममात्र सकल घरेलू उत्पाद चालू कीमतों पर और वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद आधार वर्ष की स्थिर कीमतों पर मापा जाता है।
शुद्ध घरेलू उत्पाद = सकल घरेलू उत्पाद − मूल्यह्रास
सकल राष्ट्रीय उत्पाद = सकल घरेलू उत्पाद + विदेश से शुद्ध कारक आय
शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद = सकल राष्ट्रीय उत्पाद − मूल्यह्रास
प्रतियोगी परीक्षाओं की पारंपरिक अवधारणा में कारक लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद को राष्ट्रीय आय कहा जाता है।
राष्ट्रीय आय/उत्पादन की गणना की तीन मुख्य विधियाँ हैं— उत्पादन विधि, आय विधि और व्यय विधि।
उत्पादन विधि में मूल्य-वर्धन, आय विधि में उत्पादन से उत्पन्न आय और व्यय विधि में अंतिम व्यय को आधार बनाया जाता है।
व्यय विधि का सरल सूत्र है— उपभोग + निवेश + सरकारी व्यय + (निर्यात − आयात)।