भारत की प्रमुख कृषि योजनाएँ
फसल बीमा, खाद्य सुरक्षा, बागवानी, ग्रामीण अवसंरचना और कृषि सहायता
प्रमुख कृषि योजनाएँ
भारत में कृषि उत्पादन, किसानों की आय, फसल जोखिम प्रबंधन, बागवानी विकास, ग्रामीण आधारभूत संरचना और कृषि विपणन को मजबूत करने के लिए समय-समय पर अनेक योजनाएँ और मिशन शुरू किए गए हैं।
राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन, राष्ट्रीय बागवानी मिशन, ग्रामीण अवसंरचना विकास निधि, किसान कॉल सेंटर और कृषि अवसंरचना कोष ऐसी महत्वपूर्ण पहलों में शामिल हैं।
राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना
फसल हानि के विरुद्ध बीमा सुरक्षा
राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना किसानों को प्राकृतिक आपदाओं, कीटों और रोगों के कारण अधिसूचित फसलों की उपज में होने वाली हानि से वित्तीय सुरक्षा देने के उद्देश्य से शुरू की गई थी।
इस योजना को वर्ष 1999 में स्वीकृत किया गया और इसका क्रियान्वयन रबी 1999-2000 से शुरू हुआ।
इसका प्रमुख उद्देश्य किसानों को फसल उत्पादन से जुड़े जोखिमों के विरुद्ध आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना तथा गंभीर फसल हानि के बाद उन्हें अगली फसल की खेती जारी रखने में सहायता देना था।
योजना में खाद्यान्न फसलें, तिलहन तथा निर्धारित वार्षिक वाणिज्यिक और बागवानी फसलें शामिल की जा सकती थीं।
सूखा, बाढ़, जलभराव, चक्रवात, तूफान, ओलावृष्टि, कीट तथा रोग जैसे जोखिमों के कारण होने वाली उपज हानि योजना की शर्तों के अनुसार बीमा सुरक्षा के दायरे में आती थी।
बीमा का आधार
राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना मुख्यतः क्षेत्र आधारित उपज बीमा व्यवस्था थी।
अधिकांश मामलों में किसी एक किसान के खेत की व्यक्तिगत हानि की बजाय अधिसूचित क्षेत्र की औसत उपज और निर्धारित सीमा उपज की तुलना के आधार पर क्षतिपूर्ति तय होती थी।
इसलिए इसे मौसम आधारित फसल बीमा योजना नहीं समझना चाहिए। मौसम आधारित बीमा में वर्षा, तापमान आदि मौसम संकेतकों को आधार बनाया जाता है।
प्रीमियम एवं छोटे किसान
राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना में किसान द्वारा भुगतान किया जाने वाला प्रीमियम फसल के अनुसार अलग-अलग हो सकता था।
छोटे और सीमांत किसानों के लिए प्रीमियम में सरकारी सहायता की व्यवस्था थी।
इसलिए यह कहना कि हर किसान केवल नाममात्र प्रीमियम देता था और शेष पूरा प्रीमियम सरकार देती थी, सभी फसलों और सभी किसानों के लिए सही नहीं है।
छोटे और सीमांत किसानों के लिए फसल बीमा विशेष रूप से महत्वपूर्ण था क्योंकि एक बड़ी फसल हानि उनकी आय, ऋण भुगतान और अगली फसल की क्षमता को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती थी।
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना द्वारा प्रतिस्थापन
राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना के अनुभवों और सीमाओं के आधार पर बाद में संशोधित राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना भी लागू की गई।
वर्ष 2016 में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लागू की गई, जिसने राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना तथा संशोधित राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना का स्थान लिया।
🎯 परीक्षा सूत्र
राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना — रबी 1999-2000 → संशोधित योजना → प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, 2016
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन
खाद्यान्न उत्पादन एवं उत्पादकता वृद्धि
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन की शुरुआत भारत सरकार द्वारा वर्ष 2007-08 में की गई।
इस मिशन का मूल उद्देश्य चावल, गेहूँ और दलहन का उत्पादन बढ़ाना, उत्पादकता में सुधार करना, मृदा की उर्वरता एवं उत्पादकता को बनाए रखना तथा किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करना था।
मिशन की शुरुआत विशेष रूप से चावल, गेहूँ और दालों के उत्पादन को बढ़ाने के लिए की गई थी।
बाद में इसके दायरे का विस्तार किया गया। 2014-15 से मोटे अनाज को भी राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के अंतर्गत शामिल किया गया।
मक्का, जौ तथा ज्वार, बाजरा, रागी और अन्य पोषक अनाजों से संबंधित कार्यक्रम भी इसके व्यापक दायरे में शामिल हुए।
उत्पादन बढ़ाने के प्रमुख उपाय
मिशन के अंतर्गत किसानों को उच्च उपज वाली किस्मों और संकर बीजों के उत्पादन तथा वितरण को प्रोत्साहित किया जाता है।
मृदा की उर्वरता बनाए रखने के लिए पोषक तत्व प्रबंधन, मृदा सुधारकों तथा संतुलित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा दिया जाता है।
जल का अधिक कुशल उपयोग करने वाले सिंचाई उपकरणों और संसाधन संरक्षण तकनीकों को प्रोत्साहन दिया जाता है।
उन्नत कृषि मशीनों, पौध संरक्षण उपायों, फसल प्रणाली आधारित प्रदर्शन तथा किसानों के प्रशिक्षण को भी मिशन में महत्व दिया गया है।
कटाई के बाद उपयोग होने वाले उपकरणों तथा खेत स्तर पर मूल्य संवर्धन को भी बाद के चरणों में महत्व दिया गया।
कम उत्पादकता वाले क्षेत्रों पर जोर
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन का कार्यान्वयन ऐसे चयनित जिलों और क्षेत्रों में किया गया जहाँ संबंधित फसल की उत्पादन क्षमता मौजूद थी लेकिन उत्पादकता अपेक्षाकृत कम थी।
तकनीकी जानकारी, गुणवत्तापूर्ण बीज, कृषि यंत्र, पोषक प्रबंधन और सिंचाई संबंधी सुविधाओं के बेहतर उपयोग द्वारा इन क्षेत्रों की उत्पादकता बढ़ाने का प्रयास किया गया।
पोषक अनाज
भारत सरकार ने वर्ष 2018 में अनेक मिलेट फसलों को पोषक अनाज के रूप में अधिसूचित किया।
इनमें ज्वार, बाजरा, रागी और विभिन्न छोटे मिलेट शामिल हैं।
इन फसलों को बढ़ावा देने का उद्देश्य केवल खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि पोषण सुरक्षा, जलवायु सहनशील खेती और शुष्क क्षेत्रों के किसानों के लिए बेहतर अवसर उपलब्ध कराना भी है।
📗 याद रखें
2007-08 — चावल + गेहूँ + दलहन
2014-15 — मोटे अनाज का समावेश
राष्ट्रीय बागवानी मिशन
फल, सब्जी, मसाले और अन्य बागवानी फसलें
राष्ट्रीय बागवानी मिशन की शुरुआत वर्ष 2005-06 में की गई।
इसका उद्देश्य देश में बागवानी क्षेत्र का समग्र विकास करना तथा बागवानी फसलों का उत्पादन, उत्पादकता और गुणवत्ता बढ़ाना है।
इसके अंतर्गत फल, सब्जियाँ, मसाले, फूल, सुगंधित तथा औषधीय पौधों सहित विभिन्न बागवानी गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाता है।
बागवानी कृषि विविधीकरण का महत्वपूर्ण माध्यम है और किसानों को परंपरागत खाद्यान्न फसलों के अतिरिक्त उच्च मूल्य वाली फसलों से आय प्राप्त करने का अवसर प्रदान करती है।
किसानों को उपलब्ध सहायता
मिशन के अंतर्गत गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री और पौधों की उपलब्धता बढ़ाने पर जोर दिया जाता है।
आधुनिक बागवानी तकनीक, संरक्षित खेती, पौधशालाएँ, ग्रीनहाउस और अन्य उत्पादन प्रणालियों को प्रोत्साहन दिया जाता है।
जल प्रबंधन और सिंचाई सुविधाओं के बेहतर उपयोग को बागवानी उत्पादन से जोड़ा जाता है।
कटाई के बाद प्रबंधन के लिए कोल्ड स्टोरेज, पैक हाउस, भंडारण और संबंधित सुविधाओं के विकास को भी सहायता दी जाती है।
जहाँ संबंधित योजना के नियम अनुमति देते हैं, वहाँ प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन से जुड़ी गतिविधियों के माध्यम से बागवानी उत्पादों की बर्बादी कम करने और बेहतर मूल्य प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है।
वर्तमान संरचना
राष्ट्रीय बागवानी मिशन आज स्वतंत्र अलग ढाँचे की बजाय व्यापक समेकित बागवानी विकास मिशन के अंतर्गत एक उप-योजना के रूप में लागू किया जाता है।
समेकित बागवानी विकास मिशन के माध्यम से देश के विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुसार बागवानी विकास गतिविधियाँ संचालित की जाती हैं।
केंद्र और राज्य सरकारों के सहयोग से बागवानी क्षेत्र में उत्पादन, कटाई के बाद प्रबंधन, विपणन और मूल्य शृंखला को मजबूत करने का प्रयास किया जाता है।
🎯 महत्वपूर्ण
राष्ट्रीय बागवानी मिशन — 2005-06; वर्तमान में समेकित बागवानी विकास मिशन की उप-योजना।
ग्रामीण अवसंरचना विकास निधि
नाबार्ड के माध्यम से ग्रामीण आधारभूत संरचना
ग्रामीण अवसंरचना विकास निधि की स्थापना वर्ष 1995-96 में की गई और इसका संचालन नाबार्ड के माध्यम से किया जाता है।
इस निधि की शुरुआत मुख्य रूप से उन ग्रामीण आधारभूत संरचना परियोजनाओं को पूरा करने के लिए हुई जिनमें संसाधनों की कमी के कारण काम अधूरा पड़ा था।
प्रारंभिक चरण में सिंचाई तथा कृषि से संबंधित ग्रामीण आधारभूत संरचना परियोजनाओं पर विशेष जोर था।
समय के साथ इसका दायरा काफी बढ़ा और इसमें कृषि-संबंधित क्षेत्र, सामाजिक क्षेत्र तथा ग्रामीण संपर्क से संबंधित अनेक गतिविधियाँ शामिल की गईं।
प्रमुख अवसंरचना
ग्रामीण सड़कों और पुलों के निर्माण से गाँवों को बाजार, स्कूल, अस्पताल और शहरों से बेहतर संपर्क मिलता है।
लघु एवं मध्यम सिंचाई परियोजनाएँ, जल संसाधन विकास, जलग्रहण क्षेत्र विकास और बाढ़ नियंत्रण से संबंधित कार्य इसके महत्वपूर्ण क्षेत्रों में शामिल रहे हैं।
पशुपालन, कृषि विपणन और अन्य कृषि-संबद्ध आधारभूत संरचना के विकास को भी निधि के अंतर्गत सहायता मिल सकती है।
सामाजिक क्षेत्र के विस्तार के साथ स्कूल, स्वास्थ्य सुविधाएँ, पेयजल और अन्य ग्रामीण सामाजिक अवसंरचना परियोजनाएँ भी इसके दायरे में शामिल हुईं।
ऋण व्यवस्था
ग्रामीण अवसंरचना विकास निधि के माध्यम से मुख्यतः राज्य सरकारों और पात्र राज्य-स्तरीय संस्थाओं को ग्रामीण आधारभूत संरचना परियोजनाओं के लिए ऋण सहायता दी जाती है।
इसका उद्देश्य केवल किसानों को व्यक्तिगत ऋण देना नहीं, बल्कि ऐसी सार्वजनिक ग्रामीण परिसंपत्तियाँ विकसित करना है जिनसे पूरे ग्रामीण क्षेत्र को दीर्घकालिक लाभ मिल सके।
ग्रामीण सड़क, सिंचाई और सामाजिक अवसंरचना के विस्तार से रोजगार, बाजार तक पहुँच, कृषि उत्पादकता और ग्रामीण जीवन स्तर में सुधार हो सकता है।
📗 सीधा तथ्य
ग्रामीण अवसंरचना विकास निधि — 1995-96 — नाबार्ड।
किसान कॉल सेंटर
फोन पर कृषि संबंधी विशेषज्ञ सलाह
भारत सरकार ने किसान कॉल सेंटर सेवा की शुरुआत 21 जनवरी 2004 को की।
इसका मुख्य उद्देश्य किसानों को उनकी अपनी भाषा या स्थानीय बोली में कृषि संबंधी प्रश्नों का उत्तर फोन के माध्यम से उपलब्ध कराना है।
किसान फसल उत्पादन, बीज, मृदा, उर्वरक, कीट एवं रोग नियंत्रण, सिंचाई, पशुपालन, बागवानी, मत्स्य पालन और अन्य कृषि-संबद्ध गतिविधियों के बारे में सलाह प्राप्त कर सकते हैं।
टोल-फ्री नंबर
किसान कॉल सेंटर के लिए देशव्यापी टोल-फ्री नंबर 1800-180-1551 उपलब्ध है।
सरकारी किसान कॉल सेंटर दस्तावेज में 1551 नंबर का भी उल्लेख मिलता है।
यह सेवा मोबाइल और लैंडलाइन नेटवर्क के माध्यम से किसानों की कृषि संबंधी समस्याओं के समाधान के लिए उपलब्ध कराई गई है।
भाषा और समय
किसान कॉल सेंटर में किसानों के प्रश्नों के उत्तर 22 स्थानीय भाषाओं में उपलब्ध कराए जाने की व्यवस्था है।
सेवा सभी सात दिनों में सुबह 6 बजे से रात 10 बजे तक उपलब्ध रहने की व्यवस्था है।
इसलिए “लगभग 13 से अधिक भाषाओं” वाला पुराना तथ्य वर्तमान उपलब्ध आधिकारिक विवरण की तुलना में कम है।
विशेषज्ञ सहायता व्यवस्था
किसान की कॉल सबसे पहले प्रशिक्षित कृषि टेली सलाहकार द्वारा संभाली जाती है।
ये सलाहकार कृषि या कृषि-संबद्ध क्षेत्रों में शिक्षित होते हैं और किसान के प्रश्न का उत्तर स्थानीय भाषा में देने का प्रयास करते हैं।
यदि प्रश्न का समाधान प्रथम स्तर पर संभव नहीं होता तो उसे उच्च स्तर के विषय विशेषज्ञों से जोड़ा जा सकता है।
इन विशेषज्ञों में राज्य कृषि विभाग, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, कृषि विश्वविद्यालय और अन्य संबंधित संस्थानों के विशेषज्ञ शामिल हो सकते हैं।
इस प्रकार पुरानी पुस्तकों में वर्णित तीन-स्तरीय सहायता का मूल उद्देश्य सरल प्रश्नों से लेकर विशेषज्ञ स्तर की समस्याओं तक समाधान उपलब्ध कराना था; वर्तमान व्यवस्था में कॉल एस्केलेशन और विशेषज्ञ कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से यह कार्य किया जाता है।
🎯 याद रखें
किसान कॉल सेंटर — 21 जनवरी 2004 — 1800-180-1551 — 22 स्थानीय भाषाएँ।
कृषि अवसंरचना कोष
कटाई के बाद और सामुदायिक कृषि परिसंपत्तियों के लिए वित्त
कृषि अवसंरचना कोष की शुरुआत भारत सरकार द्वारा वर्ष 2020 में की गई।
यह एक केंद्रीय क्षेत्र की योजना है जिसका उद्देश्य कृषि क्षेत्र में कटाई के बाद प्रबंधन और सामुदायिक कृषि परिसंपत्तियों से संबंधित आधारभूत संरचना के लिए मध्यम तथा दीर्घकालिक ऋण वित्त उपलब्ध कराना है।
इस योजना के अंतर्गत कुल ₹1 लाख करोड़ की वित्तीय सुविधा निर्धारित की गई।
योजना की परिचालन अवधि 2020-21 से 2032-33 तक रखी गई है।
कौन लाभ ले सकता है?
इस योजना में किसानों तथा कृषि से जुड़े विभिन्न पात्र लाभार्थियों और संस्थाओं को शामिल किया गया है।
इनमें किसान उत्पादक संगठन, प्राथमिक कृषि ऋण समितियाँ, विपणन सहकारी समितियाँ, स्वयं सहायता समूह, संयुक्त देयता समूह, बहुउद्देश्यीय सहकारी समितियाँ, कृषि उद्यमी और स्टार्टअप जैसी श्रेणियाँ शामिल हो सकती हैं।
इसके अतिरिक्त योजना के दिशा-निर्देशों के अनुसार राज्य एजेंसियाँ तथा कृषि अवसंरचना से जुड़ी अन्य पात्र संस्थाएँ भी सहायता प्राप्त कर सकती हैं।
किन परियोजनाओं के लिए सहायता?
कटाई के बाद अनाज और कृषि उत्पादों के सुरक्षित भंडारण के लिए गोदाम और साइलो जैसी संरचनाओं को वित्त उपलब्ध कराया जा सकता है।
नाशवान कृषि उत्पादों के लिए कोल्ड स्टोरेज और शीत शृंखला सुविधाओं का विकास किया जा सकता है।
ग्रेडिंग, छँटाई, पैकेजिंग, प्राथमिक प्रसंस्करण और कृषि उत्पादों के मूल्य संवर्धन से जुड़ी पात्र संरचनाओं को सहायता दी जा सकती है।
कृषि विपणन और आपूर्ति शृंखला को मजबूत करने वाली पात्र ई-विपणन तथा लॉजिस्टिक अवसंरचना को भी योजना के अंतर्गत सहायता मिल सकती है।
सामुदायिक कृषि परिसंपत्तियों के विकास से छोटे किसानों को महंगी सुविधाओं का सामूहिक उपयोग करने का अवसर मिल सकता है।
3 प्रतिशत ब्याज सहायता
कृषि अवसंरचना कोष के अंतर्गत पात्र ऋण पर 3 प्रतिशत प्रति वर्ष ब्याज सहायता उपलब्ध है।
यह ब्याज सहायता ₹2 करोड़ तक के ऋण पर उपलब्ध कराई जाती है।
यदि किसी परियोजना का ऋण ₹2 करोड़ से अधिक है तो ब्याज सहायता का लाभ निर्धारित सीमा तक ही मिलता है।
ब्याज सहायता अधिकतम सात वर्ष की अवधि तक उपलब्ध हो सकती है, जिसमें योजना के नियमों के अनुसार ऋण स्थगन अवधि भी शामिल हो सकती है।
ऋण गारंटी
पात्र उधारकर्ताओं के लिए निर्धारित शर्तों के अंतर्गत ₹2 करोड़ तक के ऋण पर ऋण गारंटी सुविधा उपलब्ध हो सकती है।
यह सुविधा छोटे उद्यमियों, किसान संगठनों और अन्य पात्र संस्थाओं के लिए बैंक ऋण प्राप्त करना अपेक्षाकृत आसान बनाने में मदद करती है।
किसानों को लाभ
पर्याप्त भंडारण सुविधा मिलने से किसान को फसल कटाई के तुरंत बाद कम कीमत पर उपज बेचने की मजबूरी कम हो सकती है।
कोल्ड स्टोरेज और शीत शृंखला की उपलब्धता से फल, सब्जियाँ और अन्य नाशवान कृषि उत्पादों की कटाई के बाद होने वाली हानि कम की जा सकती है।
ग्रेडिंग, पैकेजिंग और प्राथमिक प्रसंस्करण जैसी सुविधाएँ कृषि उत्पादों का मूल्य संवर्धन कर सकती हैं।
इन सुविधाओं के माध्यम से किसान बेहतर बाजार तक पहुँच सकते हैं और उपज का बेहतर मूल्य प्राप्त करने की संभावना बढ़ सकती है।
यह व्यवस्था बिचौलियों पर पूर्ण निर्भरता कम करने और किसान उत्पादक संगठनों तथा सामूहिक विपणन प्रणालियों को मजबूत करने में भी सहायता कर सकती है।
🎯 परीक्षा सूत्र
कृषि अवसंरचना कोष — 2020 — ₹1 लाख करोड़ — ₹2 करोड़ तक ऋण पर 3% ब्याज सहायता।
सभी योजनाएँ — एक नजर में
त्वरित तुलना
| योजना / पहल | शुरुआत | मुख्य उद्देश्य |
|---|---|---|
| राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना | रबी 1999-2000 | फसल हानि से वित्तीय सुरक्षा |
| राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन | 2007-08 | खाद्यान्न उत्पादन एवं उत्पादकता बढ़ाना |
| राष्ट्रीय बागवानी मिशन | 2005-06 | बागवानी उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाना |
| ग्रामीण अवसंरचना विकास निधि | 1995-96 | ग्रामीण आधारभूत संरचना का विकास |
| किसान कॉल सेंटर | 21 जनवरी 2004 | किसानों को फोन पर कृषि सलाह |
| कृषि अवसंरचना कोष | 2020 | कटाई के बाद और सामुदायिक कृषि आधारभूत संरचना |
मिलते-जुलते नामों में अंतर
परीक्षा में भ्रम से बचें
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन कृषि उत्पादन बढ़ाने वाली योजना है, जबकि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम पात्र लोगों को खाद्यान्न अधिकार से संबंधित कानून है। दोनों को एक न समझें।
राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना पुरानी फसल बीमा योजना थी, जबकि वर्तमान प्रमुख फसल बीमा व्यवस्था प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना है।
किसान कॉल सेंटर का संक्षिप्त नाम भी केसीसी लिखा जा सकता है, लेकिन इसे किसान क्रेडिट कार्ड से भ्रमित न करें। दोनों अलग व्यवस्थाएँ हैं।
ग्रामीण अवसंरचना विकास निधि नाबार्ड के माध्यम से ग्रामीण सार्वजनिक अवसंरचना परियोजनाओं से जुड़ी है, जबकि कृषि अवसंरचना कोष कृषि क्षेत्र में पात्र परियोजनाओं के लिए ऋण वित्त और ब्याज सहायता से जुड़ा है।
राष्ट्रीय बागवानी मिशन अब व्यापक समेकित बागवानी विकास मिशन का हिस्सा है।
⚠️ बहुत महत्वपूर्ण
केसीसी दो अलग संदर्भों में मिल सकता है — किसान कॉल सेंटर और किसान क्रेडिट कार्ड। प्रश्न का संदर्भ देखकर उत्तर दें।
⚡ अंतिम पुनरावृत्ति बिंदु
राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना रबी 1999-2000 से लागू हुई और मुख्यतः क्षेत्रीय उपज आधारित फसल बीमा व्यवस्था थी।
राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना में प्राकृतिक आपदा, कीट और रोग के कारण अधिसूचित फसलों की उपज हानि को बीमा सुरक्षा दी जाती थी।
राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना को मौसम आधारित फसल बीमा योजना के समान नहीं समझना चाहिए।
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना — 2016 ने राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना और संशोधित राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना का स्थान लिया।
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन — 2007-08 में चावल, गेहूँ और दलहन से शुरू हुआ।
मोटे अनाज — 2014-15 से राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन में शामिल किए गए।
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन में उच्च गुणवत्ता वाले बीज, मृदा सुधार, जल उपयोग दक्षता, कृषि मशीनरी और किसानों के प्रशिक्षण पर जोर दिया जाता है।
राष्ट्रीय बागवानी मिशन — 2005-06 में शुरू हुआ।
राष्ट्रीय बागवानी मिशन वर्तमान में समेकित बागवानी विकास मिशन की उप-योजना है।
ग्रामीण अवसंरचना विकास निधि — 1995-96 — नाबार्ड।
ग्रामीण अवसंरचना विकास निधि ग्रामीण सड़क, पुल, सिंचाई, जल संसाधन और सामाजिक अवसंरचना जैसी परियोजनाओं से जुड़ी है।
किसान कॉल सेंटर — 21 जनवरी 2004।
किसान कॉल सेंटर टोल-फ्री नंबर — 1800-180-1551।
किसान कॉल सेंटर में 22 स्थानीय भाषाओं में सेवा उपलब्ध कराने की व्यवस्था है।
किसान कॉल सेंटर सेवा सातों दिन सुबह 6 बजे से रात 10 बजे तक उपलब्ध रहती है।
कृषि अवसंरचना कोष — 2020 में शुरू हुआ।
कृषि अवसंरचना कोष के लिए कुल ₹1 लाख करोड़ की वित्तीय सुविधा निर्धारित की गई।
कृषि अवसंरचना कोष के अंतर्गत पात्र ऋण पर ₹2 करोड़ तक 3 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहायता उपलब्ध है।
इस योजना के अंतर्गत गोदाम, कोल्ड स्टोरेज, पैकिंग, ग्रेडिंग, प्राथमिक प्रसंस्करण और अन्य पात्र कृषि अवसंरचना विकसित की जा सकती है।
ग्रामीण अवसंरचना विकास निधि = ग्रामीण सार्वजनिक आधारभूत संरचना, जबकि कृषि अवसंरचना कोष = कृषि परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहायता।