लॉर्ड आकलैंड
1836–1842 — प्रथम आंग्ल–अफगान युद्ध, त्रिपक्षीय संधि और उत्तर-पश्चिमी नीति
लॉर्ड आकलैंड का कार्यकाल
लॉर्ड आकलैंड 1836 से 1842 ई. तक भारत का गवर्नर-जनरल रहा। उसका शासनकाल मुख्यतः प्रथम आंग्ल–अफगान युद्ध के लिए प्रसिद्ध है। ब्रिटिश सरकार को मध्य एशिया में बढ़ते रूसी और फारसी प्रभाव की चिंता थी और वह अफगानिस्तान में अपने अनुकूल शासन स्थापित करना चाहती थी। इसी नीति के कारण अंग्रेजों ने अफगान शासक दोस्त मोहम्मद खान को हटाकर शाह शुजा को सत्ता पर बैठाने का प्रयास किया।
उत्तर-पश्चिमी सीमा और अफगान नीति
रूस, फारस और अफगानिस्तान से जुड़ी ब्रिटिश चिंता
आकलैंड के समय अंग्रेजों को आशंका थी कि मध्य एशिया में रूस का बढ़ता प्रभाव भविष्य में ब्रिटिश भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा के लिए चुनौती बन सकता है। इसी व्यापक ब्रिटिश-रूसी प्रतिस्पर्धा को बाद में ग्रेट गेम के नाम से जाना गया।
उस समय काबुल पर दोस्त मोहम्मद खान का शासन था। वह पेशावर के प्रश्न पर महाराजा रणजीत सिंह से विवाद में था और अंग्रेजों से सहायता चाहता था। अंग्रेज उसकी मांगों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हुए और अंततः उन्होंने पूर्व अफगान शासक शाह शुजा को फिर से अफगानिस्तान की गद्दी पर बैठाने की नीति अपनाई।
त्रिपक्षीय संधि, 1838
अंग्रेज, रणजीत सिंह और शाह शुजा
1838 ई. में अंग्रेजों, पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह और शाह शुजा के बीच त्रिपक्षीय संधि हुई। इसका प्रमुख उद्देश्य शाह शुजा को अफगानिस्तान की सत्ता पर पुनः स्थापित करना और उत्तर-पश्चिम में अंग्रेजों के अनुकूल राजनीतिक व्यवस्था बनाना था।
इस समझौते में रणजीत सिंह की मौजूदा विजयों और क्षेत्रों को मान्यता मिलने से उसकी स्थिति भी सुरक्षित हुई। अफगानिस्तान के विरुद्ध आगे की ब्रिटिश नीति के लिए यह संधि महत्वपूर्ण आधार बनी।
🎯 महत्वपूर्ण युग्म
त्रिपक्षीय संधि, 1838 — अंग्रेज + महाराजा रणजीत सिंह + शाह शुजा।
शिमला घोषणा, 1838
अफगान अभियान की घोषणा
1 अक्टूबर 1838 ई. को लॉर्ड आकलैंड ने शिमला घोषणा जारी की। इसके माध्यम से अफगानिस्तान में हस्तक्षेप और शाह शुजा की पुनर्स्थापना की ब्रिटिश नीति को औपचारिक रूप से प्रस्तुत किया गया।
इसके बाद अंग्रेजी सेना ने अफगानिस्तान की ओर अभियान शुरू किया। इस अभियान ने आगे चलकर प्रथम आंग्ल–अफगान युद्ध का रूप लिया।
प्रथम आंग्ल–अफगान युद्ध
1838–1842 ई.
प्रथम आंग्ल–अफगान युद्ध 1838 से 1842 ई. तक चला। अंग्रेजों का मुख्य उद्देश्य दोस्त मोहम्मद खान को हटाकर अपने समर्थक शाह शुजा को अफगानिस्तान की गद्दी पर बैठाना था।
ब्रिटिश सेना ने 1839 ई. में कंधार और गजनी पर अधिकार करते हुए काबुल की ओर बढ़त बनाई और शाह शुजा को सत्ता पर बैठाया। दोस्त मोहम्मद ने बाद में अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण किया, लेकिन शाह शुजा को अफगान जनता का व्यापक समर्थन नहीं मिला।
1841 ई. में काबुल में अंग्रेजों के विरुद्ध बड़ा विद्रोह हुआ। अंग्रेजी राजनीतिक अधिकारी सर विलियम मैकनॉटन की हत्या कर दी गई और अंग्रेजों को काबुल से पीछे हटना पड़ा। जनवरी 1842 में काबुल से जलालाबाद की ओर पीछे हटती ब्रिटिश-भारतीय टुकड़ी को भारी विनाश का सामना करना पड़ा।
युद्ध के अंतिम चरण तक आकलैंड भारत से जा चुका था और लॉर्ड एलनबरो उसका उत्तराधिकारी बन चुका था। इसलिए 1842 में युद्ध की अंतिम घटनाओं को केवल आकलैंड के व्यक्तिगत शासनकाल की घटना नहीं समझना चाहिए।
⚠️ तिथि को ऐसे समझें
युद्ध — 1838–1842 ई., लेकिन लॉर्ड आकलैंड का कार्यकाल 1842 में समाप्त हुआ और युद्ध के अंतिम चरण में लॉर्ड एलनबरो गवर्नर-जनरल था।
महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु, 1839
पंजाब की राजनीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन
लॉर्ड आकलैंड के शासनकाल में 27 जून 1839 ई. को पंजाब के शक्तिशाली शासक महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु हुई। रणजीत सिंह ने पंजाब में एक शक्तिशाली सिख साम्राज्य स्थापित किया था और अंग्रेजों के साथ उसके संबंध रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण थे।
उसकी मृत्यु के बाद पंजाब में उत्तराधिकार संघर्ष और दरबारी गुटबाजी बढ़ी। आने वाले वर्षों में सिख साम्राज्य की राजनीतिक स्थिरता कमजोर हुई और अंततः अंग्रेजों तथा सिखों के बीच आंग्ल–सिख युद्धों की परिस्थितियाँ बनीं।
🎯 सीधा तथ्य
महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु — 27 जून 1839 ई. — लॉर्ड आकलैंड के शासनकाल में।
ग्वालियर युद्ध और सही गवर्नर-जनरल
1843 की घटना को आकलैंड से न जोड़ें
ग्वालियर के साथ अंग्रेजों का युद्ध 1843 ई. में हुआ, लेकिन इसे लॉर्ड आकलैंड के शासनकाल की घटना मानना सही नहीं है, क्योंकि आकलैंड का कार्यकाल 1842 ई. में समाप्त हो चुका था।
1843 ई. में ग्वालियर अभियान और महाराजपुर तथा पन्नियार की लड़ाइयाँ लॉर्ड एलनबरो के गवर्नर-जनरल काल में हुईं। इसलिए परीक्षा में ग्वालियर युद्ध, 1843 — लॉर्ड एलनबरो याद रखना चाहिए।
❌ महत्वपूर्ण सुधार
ग्वालियर युद्ध, 1843 को लॉर्ड आकलैंड से न जोड़ें। यह लॉर्ड एलनबरो के शासनकाल की घटना है।
अफगान नीति का परिणाम
महंगा और असफल ब्रिटिश अभियान
प्रथम आंग्ल–अफगान युद्ध अंग्रेजों के लिए अत्यंत महंगा और गंभीर प्रतिष्ठात्मक आघात वाला अभियान सिद्ध हुआ। शाह शुजा के माध्यम से अफगानिस्तान में स्थायी ब्रिटिश-अनुकूल शासन स्थापित करने की योजना सफल नहीं हो सकी।
अंततः दोस्त मोहम्मद खान पुनः अफगानिस्तान की सत्ता में लौटा। इस प्रकार जिस शासक को हटाने के लिए अंग्रेजों ने युद्ध शुरू किया था, वही बाद में फिर अफगानिस्तान का शासक बना।
एक नज़र में
त्वरित परीक्षा पुनरावृत्ति
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| लॉर्ड आकलैंड | 1836–1842 ई. |
| त्रिपक्षीय संधि | 1838 ई. — अंग्रेज, रणजीत सिंह और शाह शुजा |
| शिमला घोषणा | 1 अक्टूबर 1838 ई. |
| प्रथम आंग्ल–अफगान युद्ध | 1838–1842 ई. |
| अफगान शासक | दोस्त मोहम्मद खान |
| अंग्रेजों द्वारा समर्थित शासक | शाह शुजा |
| रणजीत सिंह की मृत्यु | 27 जून 1839 ई. |
| ग्वालियर युद्ध | 1843 ई. — लॉर्ड एलनबरो के काल में |
⚡ अंतिम पुनरावृत्ति
लॉर्ड आकलैंड — 1836–1842 ई.
1838 ई. — त्रिपक्षीय संधि — अंग्रेज, महाराजा रणजीत सिंह और शाह शुजा।
1 अक्टूबर 1838 ई. — शिमला घोषणा — अफगानिस्तान में ब्रिटिश हस्तक्षेप की नीति।
प्रथम आंग्ल–अफगान युद्ध — 1838–1842 ई. — दोस्त मोहम्मद को हटाकर शाह शुजा को स्थापित करने का प्रयास।
27 जून 1839 ई. — महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु।
अफगान अभियान अंग्रेजों के लिए अत्यंत महंगा और गंभीर प्रतिष्ठात्मक आघात वाला सिद्ध हुआ तथा अंततः दोस्त मोहम्मद खान पुनः सत्ता में लौटा।
ग्वालियर युद्ध, 1843 — लॉर्ड एलनबरो के शासनकाल में; इसे लॉर्ड आकलैंड से न जोड़ें।