लॉर्ड विलिंगडन
1931–1936 — गोलमेज सम्मेलन, पूना समझौता, भारत सरकार अधिनियम और किसान आंदोलन
लॉर्ड विलिंगडन का शासनकाल
लॉर्ड विलिंगडन 1931 से 1936 तक भारत का वायसराय रहा। उसका कार्यकाल भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के अत्यंत महत्वपूर्ण चरण से जुड़ा था। इसी समय द्वितीय और तृतीय गोलमेज सम्मेलन आयोजित हुए, गांधीजी और ब्रिटिश सरकार के बीच संघर्ष पुनः तेज हुआ, सांप्रदायिक निर्णय और पूना समझौता हुआ, कांग्रेस समाजवादी पार्टी तथा अखिल भारतीय किसान सभा जैसे संगठनों का उदय हुआ और भारत सरकार अधिनियम, 1935 पारित किया गया।
लॉर्ड विलिंगडन
भारत का वायसराय — 1931 से 1936
लॉर्ड विलिंगडन ने 1931 में भारत के वायसराय का पद ग्रहण किया और 1936 तक इस पद पर रहा। वह लॉर्ड इरविन के बाद भारत का वायसराय बना।
उसके शासनकाल में सविनय अवज्ञा आंदोलन का दूसरा चरण, गांधीजी की गिरफ्तारी, पूना समझौता, गोलमेज सम्मेलन, भारत सरकार अधिनियम 1935 तथा अनेक समाजवादी और किसान संगठनों की स्थापना जैसी महत्वपूर्ण घटनाएँ हुईं।
1936 में लॉर्ड विलिंगडन के बाद लॉर्ड लिनलिथगो भारत का वायसराय बना।
🎯 परीक्षा के लिए
लॉर्ड इरविन → लॉर्ड विलिंगडन → लॉर्ड लिनलिथगो वायसरायों का महत्वपूर्ण क्रम है।
द्वितीय गोलमेज सम्मेलन
1931 — लंदन
द्वितीय गोलमेज सम्मेलन 1931 में लंदन में आयोजित हुआ। इस सम्मेलन का उद्देश्य भारत में संवैधानिक सुधारों और भविष्य की शासन व्यवस्था पर विचार करना था।
महात्मा गांधी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एकमात्र आधिकारिक प्रतिनिधि के रूप में इस सम्मेलन में भाग लिया।
गांधीजी ने भारत की स्वतंत्रता और उत्तरदायी शासन की माँग रखी, लेकिन विशेष रूप से अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व और पृथक निर्वाचन के प्रश्न पर सहमति नहीं बन सकी।
द्वितीय गोलमेज सम्मेलन किसी निर्णायक राजनीतिक समझौते के बिना समाप्त हो गया और गांधीजी भारत लौट आए।
📗 याद रखें
द्वितीय गोलमेज सम्मेलन — 1931 — लंदन — गांधीजी ने भाग लिया।
सविनय अवज्ञा आंदोलन का पुनः आरंभ
1932 — गांधीजी की गिरफ्तारी
द्वितीय गोलमेज सम्मेलन से लौटने के बाद महात्मा गांधी और ब्रिटिश सरकार के बीच मतभेद फिर बढ़ गए। लॉर्ड विलिंगडन की सरकार ने कांग्रेस और राष्ट्रीय आंदोलन के प्रति कठोर नीति अपनाई।
जनवरी 1932 में सविनय अवज्ञा आंदोलन पुनः प्रारंभ हुआ और ब्रिटिश सरकार ने गांधीजी सहित अनेक कांग्रेस नेताओं को गिरफ्तार कर लिया।
4 जनवरी 1932 को गांधीजी को गिरफ्तार करके यरवदा जेल भेज दिया गया। कांग्रेस के संगठनों और गतिविधियों पर भी कठोर प्रतिबंध लगाए गए।
सांप्रदायिक निर्णय
1932 — रैम्जे मैकडोनाल्ड
ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड ने 16 अगस्त 1932 को सांप्रदायिक निर्णय की घोषणा की।
इस व्यवस्था में विभिन्न धार्मिक और सामाजिक समुदायों के लिए अलग राजनीतिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की गई और दलित वर्गों के लिए भी पृथक निर्वाचन का प्रावधान किया गया।
महात्मा गांधी ने दलित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचन का विरोध किया। उनका मानना था कि इससे हिंदू समाज का स्थायी राजनीतिक विभाजन हो जाएगा।
यरवदा जेल में गांधीजी का आमरण अनशन
20 सितंबर 1932
दलित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचन की व्यवस्था के विरोध में महात्मा गांधी ने 20 सितंबर 1932 को यरवदा जेल में आमरण अनशन प्रारंभ किया।
गांधीजी के अनशन से देशभर में व्यापक चिंता उत्पन्न हुई और दलित नेताओं तथा हिंदू समाज के अन्य नेताओं के बीच समझौते के लिए बातचीत तेज हो गई।
इन वार्ताओं में डॉ. भीमराव आंबेडकर दलित वर्गों के प्रमुख प्रतिनिधि थे।
🎯 अत्यंत महत्वपूर्ण
20 सितंबर 1932 → यरवदा जेल → गांधीजी का आमरण अनशन।
पूना समझौता
24 सितंबर 1932
गांधीजी के अनशन के दौरान दलित वर्गों के प्रतिनिधियों और हिंदू नेताओं के बीच वार्ता हुई। इसका परिणाम 24 सितंबर 1932 के पूना समझौते के रूप में सामने आया।
इस समझौते में पृथक निर्वाचन के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन को स्वीकार किया गया, लेकिन प्रांतीय विधानसभाओं में दलित वर्गों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ाई गई।
पूना समझौते से सबसे प्रमुख रूप से महात्मा गांधी और डॉ. भीमराव आंबेडकर के नाम जुड़े हैं।
समझौते के बाद 26 सितंबर 1932 को गांधीजी ने अपना आमरण अनशन समाप्त किया।
🔎 तिथियाँ साथ याद रखें
20 सितंबर 1932 — अनशन प्रारंभ
24 सितंबर 1932 — पूना समझौता
26 सितंबर 1932 — गांधीजी ने अनशन समाप्त किया
तृतीय गोलमेज सम्मेलन
1932 — लंदन
तृतीय गोलमेज सम्मेलन नवंबर से दिसंबर 1932 के बीच लंदन में आयोजित हुआ।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इस सम्मेलन में भाग नहीं लिया और महात्मा गांधी भी इसमें शामिल नहीं हुए।
तीनों गोलमेज सम्मेलनों की चर्चाओं और अन्य संवैधानिक विचार-विमर्श ने आगे चलकर भारत सरकार अधिनियम, 1935 के निर्माण की पृष्ठभूमि तैयार की।
🎯 भ्रम न रखें
द्वितीय गोलमेज सम्मेलन — गांधीजी उपस्थित
तृतीय गोलमेज सम्मेलन — गांधीजी और कांग्रेस अनुपस्थित
भारतीय सैन्य अकादमी
1932 — देहरादून
1932 में देहरादून में भारतीय सैन्य अकादमी की स्थापना की गई। इसका उद्देश्य भारतीय युवाओं को सेना में अधिकारी के रूप में प्रशिक्षित करना था।
अकादमी की स्थापना की दिशा में सर फिलिप चेटवुड की अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिशों की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
भारतीय सैन्य अकादमी का औपचारिक उद्घाटन 10 दिसंबर 1932 को किया गया।
📗 याद रखें
भारतीय सैन्य अकादमी → देहरादून → 1932।
कांग्रेस समाजवादी पार्टी
1934 — समाजवादी धारा का संगठन
1934 में कांग्रेस समाजवादी पार्टी की स्थापना भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर समाजवादी विचारधारा के नेताओं द्वारा की गई।
इस संगठन से आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया, अच्युत पटवर्धन और अशोक मेहता जैसे नेता प्रमुख रूप से जुड़े थे।
17 मई 1934 को पटना में इसके प्रथम अखिल भारतीय सम्मेलन की अध्यक्षता आचार्य नरेंद्र देव ने की। जयप्रकाश नारायण इसके प्रमुख संगठनकर्ताओं और नेताओं में थे।
कांग्रेस समाजवादी पार्टी का उद्देश्य राष्ट्रीय स्वतंत्रता के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक समानता तथा समाजवादी व्यवस्था की दिशा में कार्य करना था।
🎯 परीक्षा के लिए
कांग्रेस समाजवादी पार्टी → 1934 → आचार्य नरेंद्र देव + जयप्रकाश नारायण।
भारत सरकार अधिनियम, 1935
ब्रिटिश भारत का प्रमुख संवैधानिक अधिनियम
लॉर्ड विलिंगडन के शासनकाल में भारत सरकार अधिनियम, 1935 पारित किया गया। यह ब्रिटिश शासन के दौरान भारत के लिए बनाए गए सबसे विस्तृत संवैधानिक अधिनियमों में से एक था।
इस अधिनियम ने प्रांतों में 1919 से चली आ रही द्वैध शासन की व्यवस्था समाप्त करके प्रांतीय स्वायत्तता की व्यवस्था की।
इसके विपरीत केंद्र में द्वैध शासन की व्यवस्था प्रस्तावित की गई थी। संघीय विषयों को आरक्षित और हस्तांतरित विषयों में बाँटने की योजना थी।
लेकिन प्रस्तावित अखिल भारतीय संघ अस्तित्व में नहीं आ सका, इसलिए केंद्र में प्रस्तावित द्वैध शासन भी व्यवहार में लागू नहीं हुआ।
अधिनियम में अखिल भारतीय संघ, प्रांतीय स्वायत्तता, संघीय न्यायालय तथा संघीय और प्रांतीय लोक सेवा आयोगों जैसी व्यवस्थाएँ शामिल थीं।
🔎 सबसे महत्वपूर्ण अंतर
प्रांतों में द्वैध शासन — समाप्त
केंद्र में द्वैध शासन — प्रस्तावित, लेकिन लागू नहीं हुआ
बर्मा को भारत से अलग करने की व्यवस्था
1935 का कानून — वास्तविक पृथक्करण 1937
भारत सरकार अधिनियम, 1935 और बर्मा सरकार अधिनियम, 1935 ने बर्मा को ब्रिटिश भारत से अलग प्रशासनिक इकाई बनाने का कानूनी आधार प्रदान किया।
लेकिन यह कहना कि “1935 में ही बर्मा भारत से अलग हो गया” पूरी तरह सही नहीं है।
बर्मा का भारत से वास्तविक प्रशासनिक पृथक्करण 1 अप्रैल 1937 से प्रभावी हुआ।
इस समय तक लॉर्ड विलिंगडन का कार्यकाल समाप्त हो चुका था और लॉर्ड लिनलिथगो भारत का वायसराय था।
🎯 सही रूप में याद रखें
1935 — बर्मा को अलग करने का कानूनी प्रावधान
1 अप्रैल 1937 — बर्मा वास्तव में भारत से अलग
अखिल भारतीय किसान सभा
1936 — लखनऊ
1936 में अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना भारतीय किसान आंदोलन के इतिहास की महत्वपूर्ण घटना थी।
इसका प्रथम सम्मेलन अप्रैल 1936 में लखनऊ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन के दौरान आयोजित हुआ।
स्वामी सहजानंद सरस्वती इसके प्रथम अध्यक्ष बने। एन. जी. रंगा भी किसान आंदोलन के प्रमुख नेताओं में शामिल थे।
किसान सभा का उद्देश्य किसानों की आर्थिक समस्याओं, अत्यधिक लगान, जमींदारी शोषण और कृषि संबंधी अन्य समस्याओं को संगठित रूप से उठाना था।
📗 याद रखें
अखिल भारतीय किसान सभा → 1936 → लखनऊ → स्वामी सहजानंद सरस्वती।
महत्वपूर्ण घटनाएँ — एक नजर में
त्वरित परीक्षा पुनरावृत्ति
| वर्ष | प्रमुख घटना |
|---|---|
| 1931 | लॉर्ड विलिंगडन भारत का वायसराय बना। |
| 1931 | द्वितीय गोलमेज सम्मेलन; गांधीजी ने कांग्रेस का प्रतिनिधित्व किया। |
| 4 जनवरी 1932 | गांधीजी गिरफ्तार होकर यरवदा जेल भेजे गए। |
| 1932 | देहरादून में भारतीय सैन्य अकादमी की स्थापना। |
| 16 अगस्त 1932 | सांप्रदायिक निर्णय की घोषणा। |
| 20 सितंबर 1932 | यरवदा जेल में गांधीजी का आमरण अनशन प्रारंभ। |
| 24 सितंबर 1932 | पूना समझौता। |
| 26 सितंबर 1932 | गांधीजी ने अनशन समाप्त किया। |
| 1932 | तृतीय गोलमेज सम्मेलन। |
| 1934 | कांग्रेस समाजवादी पार्टी की स्थापना। |
| 1935 | भारत सरकार अधिनियम पारित। |
| 1936 | अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना। |
| 1936 | लॉर्ड विलिंगडन के बाद लॉर्ड लिनलिथगो वायसराय बना। |
| 1 अप्रैल 1937 | बर्मा का भारत से वास्तविक प्रशासनिक पृथक्करण प्रभावी हुआ। |
त्वरित रिविजन
एक क्रम में पूरा अध्याय
⚡ याद रखने का क्रम
⚡ अंतिम पुनरावृत्ति
लॉर्ड विलिंगडन 1931 से 1936 तक भारत का वायसराय रहा।
1931 में द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में महात्मा गांधी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया।
1932 में तृतीय गोलमेज सम्मेलन आयोजित हुआ, जिसमें कांग्रेस और गांधीजी ने भाग नहीं लिया।
1932 में देहरादून में भारतीय सैन्य अकादमी की स्थापना हुई।
16 अगस्त 1932 को रैम्जे मैकडोनाल्ड ने सांप्रदायिक निर्णय की घोषणा की।
दलित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचन के विरोध में गांधीजी ने 20 सितंबर 1932 को यरवदा जेल में आमरण अनशन प्रारंभ किया।
24 सितंबर 1932 को पूना समझौता हुआ और 26 सितंबर को गांधीजी ने अनशन समाप्त किया।
1934 में आचार्य नरेंद्र देव और जयप्रकाश नारायण सहित समाजवादी नेताओं ने कांग्रेस समाजवादी पार्टी का गठन किया।
भारत सरकार अधिनियम, 1935 ने प्रांतों में द्वैध शासन समाप्त कर प्रांतीय स्वायत्तता की व्यवस्था की तथा केंद्र में द्वैध शासन प्रस्तावित किया, लेकिन केंद्रीय द्वैध शासन लागू नहीं हुआ।
1935 के कानूनों द्वारा बर्मा को भारत से अलग करने की व्यवस्था की गई, जबकि वास्तविक पृथक्करण 1 अप्रैल 1937 से हुआ।
1936 में लखनऊ में अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना हुई और स्वामी सहजानंद सरस्वती इसके प्रथम अध्यक्ष बने।
1936 में लॉर्ड विलिंगडन के बाद लॉर्ड लिनलिथगो भारत का वायसराय बना।