लोक वित्त, बजट एवं कर व्यवस्था
सरकारी आय-व्यय, बजट, घाटा, कर, वैट, जीएसटी और वित्त आयोग
लोक वित्त का अर्थ और उद्देश्य
लोक वित्त का तात्पर्य राज्य द्वारा आय और व्यय से संबंधित कार्यों के अध्ययन से है। इसमें सरकार की आर्थिक गतिविधियाँ—जैसे कर वसूली, सार्वजनिक व्यय, सार्वजनिक ऋण, बजट तथा वित्तीय प्रशासन—शामिल होते हैं। लोक वित्त का मुख्य उद्देश्य उपलब्ध आर्थिक संसाधनों का बेहतर उपयोग करते हुए सामाजिक कल्याण, आर्थिक विकास, स्थिरता तथा सार्वजनिक आवश्यकताओं की पूर्ति सुनिश्चित करना है।
लोक वित्त
सरकार की आय, व्यय, ऋण और बजट का अध्ययन
लोक वित्त में सरकार यह तय करती है कि आय कहाँ से प्राप्त की जाए, किन क्षेत्रों में कितना व्यय किया जाए, आवश्यकता होने पर कितना ऋण लिया जाए और इन सबका अर्थव्यवस्था तथा समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
सरकार कर, शुल्क, लाभांश, ब्याज, सार्वजनिक उपक्रमों की आय और उधारी जैसे साधनों से संसाधन जुटाती है तथा शिक्षा, स्वास्थ्य, रक्षा, सड़क, आधारभूत संरचना, सामाजिक सुरक्षा और प्रशासन पर व्यय करती है।
बजट
वार्षिक वित्तीय विवरण
बजट आगामी वित्तीय वर्ष के लिए सरकार की अनुमानित प्राप्तियों और व्यय का विस्तृत दस्तावेज होता है। भारत का वित्तीय वर्ष प्रत्येक वर्ष 1 अप्रैल से 31 मार्च तक होता है।
संविधान के अनुच्छेद 112 के अंतर्गत केंद्र सरकार की अनुमानित प्राप्तियाँ और व्यय संसद के समक्ष रखे जाते हैं। भारतीय संविधान में “बजट” शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है; इसके स्थान पर “वार्षिक वित्तीय विवरण” शब्द प्रयुक्त है।
संसद में बजट प्रस्तुत करने के लिए 75 दिन की कोई संवैधानिक समय-सीमा निर्धारित नहीं है।
🎯 परीक्षा तथ्य
संघ का बजट — अनुच्छेद 112। राज्य के वार्षिक वित्तीय विवरण से संबंधित प्रावधान अनुच्छेद 202 में है।
बजट के भाग
राजस्व बजट और पूंजीगत बजट
1. राजस्व बजट
राजस्व बजट में सरकार की सामान्य आय अर्थात राजस्व प्राप्तियाँ और सामान्य व्यय अर्थात राजस्व व्यय शामिल होते हैं।
राजस्व प्राप्तियाँ दो प्रमुख भागों में होती हैं—कर प्राप्तियाँ और गैर-कर प्राप्तियाँ।
कर प्राप्तियों में आयकर, निगम कर, वस्तु एवं सेवा कर, सीमा शुल्क तथा लागू केंद्रीय उत्पाद शुल्क आदि से मिलने वाली आय शामिल होती है।
गैर-कर प्राप्तियों में लाभांश, ब्याज, शुल्क, जुर्माना तथा सरकार द्वारा दी जाने वाली विभिन्न सेवाओं से प्राप्त आय शामिल होती है।
राजस्व व्यय में वे व्यय आते हैं जिनसे सामान्यतः कोई नई परिसंपत्ति निर्मित नहीं होती और सरकार की देनदारियाँ कम नहीं होतीं; जैसे वेतन, पेंशन, ब्याज भुगतान, सब्सिडी और प्रशासनिक खर्च।
पहले सरकारी व्यय को योजनागत व्यय और गैर-योजनागत व्यय में भी बाँटा जाता था। वित्त वर्ष 2017-18 से यह वर्गीकरण समाप्त कर दिया गया।
2. पूंजीगत बजट
पूंजीगत बजट में वे लेनदेन शामिल होते हैं जो सरकार की परिसंपत्तियों और देनदारियों को प्रभावित करते हैं।
पूंजीगत प्राप्तियों में ऋण या उधारी से प्राप्त रकम, सरकार द्वारा दिए गए ऋणों की वसूली तथा परिसंपत्तियों या निवेश की बिक्री से प्राप्त रकम शामिल होती है।
पूंजीगत व्यय में संपत्ति या पूंजी निर्माण पर खर्च, जैसे सड़क, भवन, मशीनरी और अन्य दीर्घकालीन परिसंपत्तियों का निर्माण या अधिग्रहण शामिल होता है।
ऋण की अदायगी से सरकार की देनदारी घटती है और यह पूंजीगत खाते से संबंधित लेनदेन है।
बजट में दिए जाने वाले आँकड़े
वास्तविक, संशोधित और बजट अनुमान
बजट में सामान्यतः पिछले वित्त वर्ष के वास्तविक आँकड़े, चालू वित्त वर्ष के संशोधित अनुमान तथा आगामी वित्त वर्ष के बजट अनुमान दर्शाए जाते हैं।
वास्तविक आँकड़े बताते हैं कि वास्तव में कितनी आय और व्यय हुआ। संशोधित अनुमान चालू वर्ष की नवीन स्थिति के अनुसार बदला हुआ अनुमान होता है। बजट अनुमान आगामी वित्त वर्ष के लिए अनुमानित प्राप्तियों और व्यय को दर्शाता है।
आय-व्यय के आधार पर बजट के प्रकार
संतुलित, घाटे का और अधिशेष बजट
| प्रकार | स्थिति | अर्थ |
|---|---|---|
| संतुलित बजट | आय = व्यय | जब सरकार की आय और व्यय बराबर हों। |
| घाटे का बजट | व्यय > आय | जब सरकार का व्यय उसकी आय से अधिक हो। |
| अधिशेष बजट | आय > व्यय | जब सरकार की आय उसके व्यय से अधिक हो। |
रेल बजट और सामान्य बजट
अलग व्यवस्था से एकीकृत बजट तक
भारत में रेल बजट को सामान्य बजट से अलग करने की सिफारिश 1921 की एकवर्थ समिति ने की थी। अलग रेल बजट प्रस्तुत करने की व्यवस्था 1924 से शुरू हुई।
वित्त वर्ष 2017-18 से रेल बजट और सामान्य बजट को मिलाकर एकीकृत केंद्रीय बजट प्रस्तुत किया जाने लगा।
राजकोषीय घाटा
सरकार की उधारी आवश्यकता का प्रमुख सूचक
राजकोषीय घाटा सरकार के कुल व्यय और उधारी को छोड़कर उसकी कुल प्राप्तियों के बीच का अंतर है।
राजकोषीय घाटा = कुल व्यय − (राजस्व प्राप्तियाँ + गैर-ऋण पूंजीगत प्राप्तियाँ)
यह बताता है कि सरकार को अपने कुल व्यय को पूरा करने के लिए कितनी उधारी की आवश्यकता पड़ेगी।
राजकोषीय घाटा कम करने के लिए सरकार राजस्व बढ़ाने, अनुत्पादक व्यय नियंत्रित करने, व्यय की गुणवत्ता सुधारने तथा बेहतर ऋण-प्रबंधन जैसे उपाय कर सकती है।
राजकोषीय घाटा आर्थिक स्थिति का महत्वपूर्ण संकेतक है, लेकिन केवल घाटा होना अपने-आप आर्थिक असंतुलन का प्रमाण नहीं है। घाटे का आकार, कारण और उधार लिए गए धन का उपयोग भी महत्वपूर्ण होता है।
🎯 साथ में याद रखें
राजस्व घाटा = राजस्व व्यय − राजस्व प्राप्तियाँ
प्राथमिक घाटा = राजकोषीय घाटा − ब्याज भुगतान
राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन अधिनियम, 2003
वित्तीय अनुशासन और पारदर्शिता
राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन अधिनियम, 2003 केंद्र सरकार की वित्तीय स्थिति को अधिक अनुशासित, पारदर्शी और दीर्घकालीन रूप से टिकाऊ बनाने के उद्देश्य से बनाया गया।
यह अधिनियम 5 जुलाई 2004 से प्रभावी हुआ। इसका उद्देश्य राजकोषीय घाटे और सरकारी ऋण को नियंत्रित करने के लिए उत्तरदायी वित्तीय प्रबंधन की व्यवस्था विकसित करना है।
समय-समय पर इस अधिनियम और इसके नियमों में संशोधन किए गए हैं। इसलिए शुरुआती वर्षों के घाटा-घटाने वाले लक्ष्यों को वर्तमान स्थायी लक्ष्य नहीं समझना चाहिए।
बजट से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य
त्वरित पुनरावृत्ति
- भारतीय संविधान में “बजट” शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है; अनुच्छेद 112 में वार्षिक वित्तीय विवरण कहा गया है।
- भारत का केंद्रीय बजट संविधान के अनुच्छेद 112 के अंतर्गत प्रस्तुत किया जाता है।
- बजट के दो प्रमुख भाग हैं—राजस्व बजट और पूंजीगत बजट।
- 2017-18 से रेल बजट को सामान्य बजट में मिला दिया गया।
- राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन अधिनियम, 2003 वित्तीय अनुशासन से संबंधित प्रमुख कानून है।
- राजकोषीय घाटा सरकार की उधारी आवश्यकता का महत्वपूर्ण संकेतक है।
कर संरचना
सरकारी राजस्व का प्रमुख स्रोत
कर वह अनिवार्य भुगतान है जिसे सरकार कानून के आधार पर आय, लाभ, संपत्ति, वस्तुओं, सेवाओं या अन्य करयोग्य गतिविधियों पर लगाती है।
कर से प्राप्त धन का उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य, रक्षा, सड़क, प्रशासन और अन्य सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए किया जाता है।
कर भुगतान के बदले करदाता को उसी अनुपात में कोई प्रत्यक्ष और निश्चित व्यक्तिगत प्रतिफल नहीं मिलता।
करों को मुख्यतः दो भागों में बाँटा जाता है—प्रत्यक्ष कर और अप्रत्यक्ष कर।
प्रत्यक्ष कर
कर का भार सामान्यतः उसी करदाता पर
प्रत्यक्ष कर ऐसा कर है जिसे सामान्यतः वही व्यक्ति या संस्था अदा करती है जिस पर वह लागू होता है।
इसका कानूनी भार सामान्यतः किसी दूसरे व्यक्ति पर स्थानांतरित नहीं किया जा सकता।
करदाता और कर-भार वहन करने वाला सामान्यतः एक ही होता है।
यह कर आमतौर पर आय, लाभ या पूंजीगत लाभ जैसी करयोग्य आय पर आधारित होता है।
केंद्र से संबंधित प्रत्यक्ष कर
आयकर व्यक्तियों तथा अन्य गैर-कॉरपोरेट करदाताओं की करयोग्य आय पर लगाया जाता है।
निगम कर कंपनियों की करयोग्य आय या लाभ पर लगाया जाता है।
पूंजीगत लाभ आयकर व्यवस्था के अंतर्गत एक आय-शीर्ष है। निर्धारित पूंजीगत परिसंपत्ति के हस्तांतरण से हुए करयोग्य लाभ पर लागू नियमों के अनुसार कर लगता है।
ब्याज कर पुरानी कर-व्यवस्था से संबंधित था और वर्तमान प्रमुख केंद्रीय प्रत्यक्ष कर के रूप में लागू नहीं है।
लाभांश पर कर की व्यवस्था समय के साथ बदली है। वर्तमान व्यवस्था में लाभांश सामान्यतः प्राप्तकर्ता की करयोग्य आय में शामिल होकर लागू आयकर नियमों के अनुसार करयोग्य हो सकता है।
उपहार कर के लिए पुराना पृथक उपहार कर अधिनियम समाप्त हो चुका है। फिर भी आयकर कानून के अंतर्गत कुछ परिस्थितियों में बिना प्रतिफल या अपर्याप्त प्रतिफल पर प्राप्त धन या संपत्ति करयोग्य हो सकती है।
धन कर वित्त अधिनियम 2015 से समाप्त कर दिया गया। इसे वर्तमान कर के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए।
प्रतिभूति लेन-देन कर निर्धारित प्रतिभूति लेन-देन पर लगाया जाता है।
लाभांश वितरण कर पुरानी व्यवस्था थी। इसे 1 अप्रैल 2020 से समाप्त कर दिया गया।
राज्य और स्थानीय स्तर से संबंधित कर
भू-राजस्व राज्यों से संबंधित राजस्व स्रोत है।
कृषि आय पर कर राज्यों के विधायी क्षेत्र का विषय है। सभी राज्य कृषि आय पर कर नहीं लगाते।
व्यवसाय कर तथा व्यवसाय, व्यापार, आजीविका और रोजगार पर कर संविधान के अनुच्छेद 276 से संबंधित है।
होटल प्राप्तियों पर अलग कर जैसी पुरानी कर-व्यवस्थाएँ जीएसटी के बाद व्यापक रूप से बदल चुकी हैं। होटल सेवाओं पर सामान्यतः जीएसटी व्यवस्था लागू होती है।
अचल संपत्तियों पर संपत्ति कर सामान्यतः नगर निगम, नगरपालिका जैसे स्थानीय निकायों का महत्वपूर्ण राजस्व स्रोत है।
रोजगार पर कर भी अनुच्छेद 276 के अंतर्गत व्यवसाय, व्यापार, आजीविका और रोजगार पर कर की श्रेणी से जुड़ा है।
पथ कर या मोटर वाहन कर राज्य सरकारों से संबंधित कर है।
📗 प्रत्यक्ष कर की महत्वपूर्ण बातें
प्रत्यक्ष करों की वसूली और नीति-निर्धारण में केंद्र तथा राज्य अपनी संवैधानिक शक्तियों के अनुसार भूमिका निभाते हैं।
कर अनुपालन बढ़ाने के लिए स्थायी खाता संख्या, स्रोत पर कर कटौती और आयकर विवरणी जैसी व्यवस्थाएँ उपयोग की जाती हैं।
प्रत्यक्ष करों में पारदर्शिता की संभावना अधिक होती है, फिर भी कर-चोरी या कर-परिहार की संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं होती।
व्यक्तिगत आयकर की दर-संरचना प्रगतिशील हो सकती है, लेकिन हर प्रत्यक्ष कर को अनिवार्य रूप से प्रगतिशील कहना सही नहीं है।
अप्रत्यक्ष कर
वस्तुओं और सेवाओं के माध्यम से कर-भार
अप्रत्यक्ष कर वे कर हैं जिन्हें व्यवसाय या विक्रेता सरकार को जमा करता है, जबकि उनका आर्थिक भार वस्तु या सेवा की कीमत के माध्यम से उपभोक्ता तक स्थानांतरित हो सकता है।
उपभोक्ता वस्तु या सेवा खरीदते समय कीमत में शामिल कर चुकाता है और विक्रेता या आपूर्तिकर्ता लागू व्यवस्था के अनुसार सरकार को कर जमा करता है।
जीएसटी से पहले केंद्र से संबंधित प्रमुख अप्रत्यक्ष कर
1. केंद्रीय उत्पाद शुल्क — देश में उत्पादित निर्धारित वस्तुओं पर लगाया जाता था। जीएसटी के बाद इसका अधिकांश क्षेत्र जीएसटी में समाहित हुआ, लेकिन कुछ वस्तुओं पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क अभी भी लागू है।
2. सीमा शुल्क — मुख्यतः आयात पर तथा कानून के अनुसार कुछ निर्यात पर लगाया जाता है। सीमा शुल्क जीएसटी में पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।
3. सेवा कर — सेवाओं पर लगाया जाता था। 1 जुलाई 2017 से अधिकांश सेवाएँ जीएसटी व्यवस्था में आ गईं और सेवा कर समाप्त हो गया।
4. केंद्रीय बिक्री कर — अंतर्राज्यीय वस्तु-विक्रय से संबंधित पुरानी व्यवस्था का महत्वपूर्ण कर था। जीएसटी के बाद इसका व्यावहारिक क्षेत्र बहुत सीमित हो गया।
5. केंद्रीय व्यापार कर — इस नाम से अलग प्रमुख मानक केंद्रीय कर-श्रेणी नहीं मानी जाती। इसे व्यापार या बिक्री कर से भ्रमित नहीं करना चाहिए।
यह कहना सही नहीं है कि ऊपर बताए गए सभी कर जीएसटी में पूरी तरह समाहित हो गए।
राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों से संबंधित प्रमुख कर/शुल्क
1. मूल्य वर्धित कर — जीएसटी से पहले राज्यों का प्रमुख अप्रत्यक्ष कर था। जीएसटी के बाद अधिकांश वस्तुओं पर इसका स्थान जीएसटी ने लिया, लेकिन कुछ पेट्रोलियम उत्पादों पर राज्य वैट अभी भी लागू है।
2. व्यापार कर और बिक्री कर — जीएसटी से पहले राज्यों की महत्वपूर्ण कर व्यवस्थाएँ थीं। अधिकांश क्षेत्र जीएसटी में समाहित हुआ।
3. शिक्षा उपकर और मनोरंजन कर — पुरानी शिक्षा उपकर व्यवस्थाएँ बदली हैं। राज्य-स्तरीय मनोरंजन कर का अधिकांश भाग जीएसटी में समाहित हुआ, लेकिन स्थानीय निकायों द्वारा लगाया जाने वाला मनोरंजन कर अलग हो सकता है।
4. परिवहन कर और वाहन कर — मोटर वाहन कर राज्यों के अधिकार क्षेत्र में बना हुआ है।
5. विज्ञापन कर, स्टाम्प और पंजीयन शुल्क — स्टाम्प शुल्क और पंजीयन शुल्क जीएसटी में पूरी तरह समाहित नहीं हुए।
6. सट्टेबाजी और जुए पर कर — पुरानी राज्य कर-व्यवस्था का हिस्सा रहा है। वर्तमान जीएसटी कानून में भी कुछ निर्दिष्ट गेमिंग और सट्टेबाजी गतिविधियों के लिए विशेष प्रावधान हैं।
7. चुंगी या ऑक्ट्रॉय — स्थानीय सीमा में माल के प्रवेश पर लगाया जाने वाला पुराना स्थानीय कर था। इसका पारंपरिक रूप व्यापक रूप से समाप्त हो चुका है।
8. विद्युत पर कर या शुल्क — विद्युत शुल्क जीएसटी में समाहित नहीं हुआ है।
9. डीजल और पेट्रोल पर बिक्री कर या वैट — पेट्रोल और हाई स्पीड डीजल सहित कुछ पेट्रोलियम उत्पाद वर्तमान में जीएसटी से बाहर हैं और इन पर अलग कर व्यवस्था लागू है।
मानव उपभोग के लिए मदिरा, स्टाम्प शुल्क, विद्युत शुल्क, सीमा शुल्क और कुछ पेट्रोलियम उत्पादों पर लागू कर जीएसटी से अलग व्यवस्था में बने हुए हैं।
भारत में कर-विभाजन
संघ और राज्यों के बीच संवैधानिक व्यवस्था
अनुच्छेद 268
अनुच्छेद 268 के अंतर्गत कुछ शुल्क संघ द्वारा लगाए जाते हैं, लेकिन उनका संग्रह और विनियोजन राज्यों द्वारा किया जाता है।
वर्तमान व्यवस्था में प्रमुख उदाहरण संघ सूची में उल्लिखित कुछ स्टाम्प शुल्क हैं।
पुरानी पुस्तकों में औषधि और सौंदर्य प्रसाधनों पर उत्पाद शुल्क का उदाहरण दिया जाता था, लेकिन यह वर्तमान अनुच्छेद 268 की परीक्षा-सुरक्षित सूची में नहीं है।
अनुच्छेद 269
अनुच्छेद 269 के अंतर्गत कुछ कर संघ द्वारा लगाए और संग्रहित किए जाते हैं, लेकिन उनका राजस्व राज्यों को सौंपा जाता है।
वर्तमान प्रावधान मुख्यतः अंतर्राज्यीय व्यापार या वाणिज्य के दौरान वस्तुओं की बिक्री या खरीद तथा प्रेषण से संबंधित है, अनुच्छेद 269क के अधीन जीएसटी को छोड़कर।
पुरानी पुस्तकों में उत्तराधिकार शुल्क, संपदा शुल्क, रेल भाड़ा और बाजार सौदों पर कर जैसे उदाहरण मिलते हैं। इन्हें वर्तमान उदाहरण के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए।
अनुच्छेद 269क
अनुच्छेद 269क अंतर्राज्यीय आपूर्ति पर वस्तु एवं सेवा कर से संबंधित है।
यह कर केंद्र द्वारा लगाया और संग्रहित किया जाता है तथा संघ और राज्यों में निर्धारित व्यवस्था के अनुसार बाँटा जाता है।
आयात को भी इस उद्देश्य से अंतर्राज्यीय आपूर्ति माना जाता है।
अनुच्छेद 270
अनुच्छेद 270 के अंतर्गत संघ द्वारा लगाए और संग्रहित कई करों के निवल आगम का हिस्सा संघ और राज्यों के बीच बाँटा जाता है।
व्यक्तिगत आयकर और निगम कर जैसे संघीय कर विभाज्य कर-समूह का हिस्सा हो सकते हैं।
अनुच्छेद 271
संसद संघ के प्रयोजनों के लिए कुछ करों और शुल्कों पर अधिभार लगा सकती है।
ऐसे अधिभार का पूरा आगम केंद्र के पास रहता है और सामान्य विभाज्य कर-समूह में राज्यों के साथ साझा नहीं किया जाता।
वस्तु एवं सेवा कर पर अनुच्छेद 271 के अंतर्गत अधिभार नहीं लगाया जाता।
गैर-योजनागत अनुदान और सहायता-अनुदान
पुरानी और वर्तमान व्यवस्था
पुरानी बजट व्यवस्था में गैर-योजनागत अनुदान शब्द का प्रयोग राज्यों की सामान्य प्रशासनिक जरूरतों, राजस्व अंतर, आपदा राहत या अन्य विशेष आवश्यकताओं से जुड़े अनुदानों के संदर्भ में किया जाता था।
ऐसे अनुदान राज्यों की वित्तीय स्थिति को संतुलित करने में सहायक हो सकते थे।
वित्त आयोग विभिन्न प्रकार के सहायता-अनुदानों के संबंध में सिफारिश करता है।
2017-18 से योजनागत और गैर-योजनागत वर्गीकरण समाप्त हो चुका है। इसलिए गैर-योजनागत अनुदान को वर्तमान स्वतंत्र बजटीय श्रेणी के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए।
संविधान के अनुच्छेद 275 में राज्यों को सहायता-अनुदान का प्रावधान है।
मूल्य वर्धित कर
जोड़े गए मूल्य पर कर
मूल्य वर्धित कर ऐसी कर-पद्धति है जिसमें किसी वस्तु के उत्पादन और वितरण की प्रत्येक अवस्था में उस चरण पर जोड़े गए मूल्य के आधार पर कर-देयता निर्धारित होती है।
उदाहरण के लिए वस्तु किसान से व्यापारी, व्यापारी से दुकानदार और दुकानदार से ग्राहक तक पहुँचते समय अलग-अलग चरणों से गुजर सकती है।
व्यापारी अपने द्वारा जोड़े गए मूल्य के संबंध में कर देता है और पहले चरण में चुकाए गए पात्र कर की साख लेने की व्यवस्था के कारण कर के ऊपर कर लगने की समस्या कम होती है।
भारत में राज्य-स्तरीय वैट का व्यापक क्रियान्वयन 1 अप्रैल 2005 से हुआ।
हरियाणा ने 1 अप्रैल 2003 से वैट लागू कर दिया था और इसे वैट लागू करने वाला पहला राज्य माना जाता है।
उदाहरण से समझिए
यदि लकड़ी का खिलौना बनाने वाले ने ₹100 में कच्चा माल खरीदा और काम करके खिलौना ₹150 में बेचा, तो उसने इस चरण में ₹50 का मूल्य जोड़ा। सरल अवधारणा में वैट इसी मूल्य-वृद्धि को कराधान का आधार बनाता है।
📗 मूल अवधारणा
वैट का उद्देश्य हर चरण पर केवल जोड़े गए मूल्य को कराधान का आधार बनाना है, न कि बिना कर-साख के बार-बार पूरे मूल्य पर कर लगाना।
वस्तु एवं सेवा कर
भारत की व्यापक गंतव्य-आधारित अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था
वस्तु एवं सेवा कर वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति पर लगाया जाने वाला व्यापक, गंतव्य-आधारित अप्रत्यक्ष कर है।
जीएसटी से पहले उत्पाद शुल्क, सेवा कर, वैट और अन्य अनेक अप्रत्यक्ष करों के कारण व्यवस्था जटिल थी। जीएसटी ने इनमें से अनेक करों को समाहित करके करों के दोहराव को कम करने और व्यवस्था को सरल बनाने का प्रयास किया।
जीएसटी को सामान्य रूप से “एक राष्ट्र, एक कर” की अवधारणा से जोड़ा जाता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि देश में अब केवल एक ही कर या एक ही जीएसटी दर है।
संविधान का 101वाँ संशोधन अधिनियम, 2016 राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद 8 सितंबर 2016 को अधिनियमित हुआ।
जीएसटी पूरे देश में 1 जुलाई 2017 से लागू किया गया।
जीएसटी परिषद
अनुच्छेद 279क
जीएसटी परिषद संविधान के अनुच्छेद 279क के अंतर्गत गठित केंद्र और राज्यों का संयुक्त संवैधानिक मंच है।
इसके अध्यक्ष केंद्रीय वित्त मंत्री होते हैं।
केंद्रीय राजस्व या वित्त राज्य मंत्री इसके सदस्य होते हैं। प्रत्येक राज्य सरकार वित्त या कराधान प्रभारी मंत्री अथवा किसी अन्य मंत्री को सदस्य के रूप में नामित करती है।
राज्यों के प्रतिनिधि सदस्य अपने बीच से किसी एक सदस्य को परिषद का उपाध्यक्ष चुन सकते हैं।
परिषद जीएसटी की दरों, छूट, सीमा, मॉडल कानून, आपूर्ति-स्थान और अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर केंद्र तथा राज्यों को सिफारिशें करती है।
🎯 मतदान
निर्णय के लिए उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के भारित मतों का कम-से-कम तीन-चौथाई बहुमत आवश्यक है। केंद्र के मत का भार एक-तिहाई और सभी राज्यों के मतों का संयुक्त भार दो-तिहाई है।
जीएसटी में समाहित प्रमुख पुराने कर
केंद्र और राज्यों के अनेक अप्रत्यक्ष कर
केंद्र स्तर पर पुराने उत्पाद शुल्क के अधिकांश हिस्से, सेवा कर, अतिरिक्त उत्पाद शुल्क तथा कुछ अतिरिक्त सीमा शुल्क जैसी व्यवस्थाएँ जीएसटी में समाहित हुईं।
राज्य स्तर पर राज्य वैट या बिक्री कर के अधिकांश हिस्से, प्रवेश कर, विलासिता कर, खरीद कर तथा राज्य द्वारा लगाए जाने वाले मनोरंजन और आमोद-प्रमोद कर जैसी अनेक व्यवस्थाएँ जीएसटी में समाहित हुईं।
सीमा शुल्क, स्टाम्प शुल्क, विद्युत शुल्क, मानव उपभोग के लिए मदिरा और जीएसटी से बाहर रखे गए कुछ पेट्रोलियम उत्पादों पर कर जीएसटी में पूरी तरह समाहित नहीं हुए हैं।
जीएसटी से जुड़े प्रमुख संवैधानिक अनुच्छेद
246क, 269क और 279क
| अनुच्छेद | मुख्य विषय |
|---|---|
| 246क | संसद और राज्य विधानमंडलों को वस्तु एवं सेवा कर पर कानून बनाने की शक्ति। |
| 269क | अंतर्राज्यीय आपूर्ति पर वस्तु एवं सेवा कर का संग्रह और संघ-राज्य के बीच बँटवारा। |
| 279क | वस्तु एवं सेवा कर परिषद का गठन और कार्य। |
वित्त आयोग और करों का बँटवारा
अनुच्छेद 280
केंद्र और राज्यों के बीच विभाज्य केंद्रीय करों के निवल आगम के वितरण के संबंध में वित्त आयोग महत्वपूर्ण सिफारिशें करता है।
वित्त आयोग का संवैधानिक प्रावधान अनुच्छेद 280 में है।
राष्ट्रपति सामान्यतः प्रत्येक पाँचवें वर्ष या आवश्यकता होने पर उससे पहले वित्त आयोग का गठन करता है।
आयोग संघ और राज्यों के बीच कर-वितरण, राज्यों के बीच उनके हिस्से का वितरण और सहायता-अनुदानों के सिद्धांतों सहित निर्धारित विषयों पर सिफारिश करता है।
14वाँ वित्त आयोग
2015-20
14वें वित्त आयोग की अध्यक्षता डॉ. वाई. वी. रेड्डी ने की थी। इसकी प्रमुख सिफारिश अवधि 2015-20 थी।
इस आयोग ने राज्यों के लिए विभाज्य केंद्रीय करों में हिस्सेदारी को 42% करने की सिफारिश की थी।
राज्यों के बीच कर-वितरण के लिए प्रमुख मानदंड थे—आय दूरी 50%, 1971 की जनसंख्या 17.5%, 2011 की जनसंख्या 10%, क्षेत्रफल 15% और वन आवरण 7.5%।
15वाँ वित्त आयोग
2020-21 तथा 2021-26
15वें वित्त आयोग की अध्यक्षता एन. के. सिंह ने की।
इसे केवल “2020-25” कहना सही नहीं है। आयोग ने पहले 2020-21 के लिए रिपोर्ट दी और फिर 2021-26 की अवधि के लिए अंतिम रिपोर्ट दी।
15वें वित्त आयोग ने राज्यों के लिए विभाज्य केंद्रीय करों में 41% हिस्सेदारी की सिफारिश की।
इसके राज्यों के बीच वितरण के मानदंड थे—आय दूरी 45%, 2011 की जनसंख्या 15%, क्षेत्रफल 15%, वन एवं पारिस्थितिकी 10%, जनसांख्यिकीय प्रदर्शन 12.5% तथा कर एवं राजकोषीय प्रयास 2.5%।
1971 की जनसंख्या 17.5% और 2011 की जनसंख्या 10% वाला भार 14वें वित्त आयोग का था, 15वें का नहीं।
16वाँ वित्त आयोग
2026-31
16वाँ वित्त आयोग डॉ. अरविंद पनगढ़िया की अध्यक्षता में गठित किया गया।
इसकी सिफारिशों की अवधि 1 अप्रैल 2026 से 31 मार्च 2031 है।
इसलिए वर्तमान अध्ययन में 15वें वित्त आयोग को पिछले आयोग और 16वें वित्त आयोग को 2026-31 की वर्तमान वित्त आयोग अवधि के संदर्भ में पढ़ना चाहिए।
महत्वपूर्ण भ्रम से बचें
परीक्षा-सुरक्षित तथ्य
बजट प्रस्तुत करने के लिए संविधान में 75 दिन की निश्चित अवधि निर्धारित नहीं है।
1921 एकवर्थ समिति की सिफारिश का वर्ष है; अलग रेल बजट की व्यवस्था 1924 से शुरू हुई।
योजनागत और गैर-योजनागत व्यय का वर्गीकरण 2017-18 से समाप्त हो चुका है।
धन कर, पृथक उपहार कर और लाभांश वितरण कर को वर्तमान प्रमुख प्रत्यक्ष करों के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए।
सभी अप्रत्यक्ष कर जीएसटी में समाहित हो गए—यह कथन सही नहीं है।
अनुच्छेद 268 और 269 के कई पुराने उदाहरण वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था में परीक्षा-सुरक्षित उदाहरण नहीं हैं।
1971 की जनसंख्या 17.5% और 2011 की जनसंख्या 10% वाला भार 14वें वित्त आयोग का था।
त्वरित पुनरावृत्ति
एसएससी और रेलवे के लिए
⚡ एक नज़र में
⚡ अंतिम पुनरावृत्ति बिंदु
लोक वित्त में सरकार की आय, व्यय, कर, सार्वजनिक ऋण और बजट का अध्ययन किया जाता है।
भारतीय संविधान में संघ के बजट को वार्षिक वित्तीय विवरण कहा गया है—अनुच्छेद 112।
बजट के मुख्य भाग—राजस्व बजट और पूंजीगत बजट।
योजनागत और गैर-योजनागत व्यय का भेद 2017-18 से समाप्त है।
रेल बजट की अलग व्यवस्था 1924 से शुरू हुई और 2017-18 से सामान्य बजट में विलय हो गई।
राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन अधिनियम 2003 में पारित और 5 जुलाई 2004 से प्रभावी हुआ।
प्रत्यक्ष कर का भार सामान्यतः उसी व्यक्ति पर रहता है जिस पर कर लगाया गया है; अप्रत्यक्ष कर का आर्थिक भार कीमत के माध्यम से स्थानांतरित हो सकता है।
वैट का व्यापक राज्य-स्तरीय क्रियान्वयन 1 अप्रैल 2005 से हुआ; हरियाणा ने इसे 1 अप्रैल 2003 से लागू किया था।
जीएसटी—101वाँ संविधान संशोधन, 2016; लागू 1 जुलाई 2017।
अंतर्राज्यीय जीएसटी—अनुच्छेद 269क; जीएसटी परिषद—अनुच्छेद 279क; वित्त आयोग—अनुच्छेद 280।
14वाँ वित्त आयोग—डॉ. वाई. वी. रेड्डी; 15वाँ—एन. के. सिंह; 16वाँ—डॉ. अरविंद पनगढ़िया।