विधवा पुनर्विवाह
विधवा पुनर्विवाह आंदोलन
उन्नीसवीं शताब्दी के भारतीय समाज सुधार आंदोलनों में विधवा पुनर्विवाह आंदोलन का महत्वपूर्ण स्थान है। तत्कालीन समाज के अनेक वर्गों में हिंदू विधवाओं, विशेषकर कम आयु की विधवाओं, के पुनर्विवाह को सामाजिक स्वीकृति प्राप्त नहीं थी।
इस स्थिति में ईश्वरचंद्र विद्यासागर, विष्णुशास्त्री पंडित और धोंडो केशव कर्वे जैसे समाज सुधारकों ने अलग-अलग क्षेत्रों में विधवा पुनर्विवाह और विधवाओं की शिक्षा तथा पुनर्वास के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए। इन प्रयासों का सबसे महत्वपूर्ण प्रारंभिक कानूनी परिणाम हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1856 था।
ईश्वरचंद्र विद्यासागर और विधवा पुनर्विवाह
ईश्वरचंद्र विद्यासागर हिंदू विधवा पुनर्विवाह को कानूनी मान्यता दिलाने वाले आंदोलन के सबसे प्रमुख भारतीय समाज सुधारकों में थे।
उन्होंने हिंदू धर्मग्रंथों का अध्ययन करके यह तर्क प्रस्तुत किया कि विधवा पुनर्विवाह के विरुद्ध प्रचलित सामाजिक प्रतिबंध को हिंदू धर्म की अनिवार्य व्यवस्था नहीं माना जा सकता।
उन्होंने सरकार को याचिकाएँ भेजीं और विधवा पुनर्विवाह के पक्ष में व्यापक सामाजिक अभियान चलाया। उनके प्रयासों ने 1856 के विधवा पुनर्विवाह कानून के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
परीक्षा के लिए
हिंदू विधवा पुनर्विवाह आंदोलन के प्रमुख समाज सुधारक — ईश्वरचंद्र विद्यासागर।
हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1856
1856 ई. में हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित किया गया, जिसने हिंदू विधवाओं के पुनर्विवाह के रास्ते में मौजूद कानूनी बाधाओं को समाप्त किया।
इस कानून का आधिकारिक क्रमांक 1856 का अधिनियम संख्या XV था। इसलिए इसे “नियम XV” लिखने के बजाय अधिनियम XV, 1856 लिखना अधिक सही है।
इस अधिनियम ने स्पष्ट किया कि किसी हिंदू विधवा का पुनर्विवाह केवल इसलिए अवैध नहीं माना जाएगा कि उसका पहले विवाह हो चुका था और उसके पहले पति की मृत्यु हो चुकी है।
कानून ने ऐसे वैध पुनर्विवाह से जन्म लेने वाली संतानों की वैधता को भी कानूनी संरक्षण दिया।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य
हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम — 1856 — अधिनियम संख्या XV — विधवा पुनर्विवाह को कानूनी मान्यता।
लॉर्ड कैनिंग के समय कानून
हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम को 1856 ई. में लॉर्ड कैनिंग के शासनकाल में कानूनी स्वीकृति प्राप्त हुई।
इस अधिनियम को 25 जुलाई 1856 ई. को गवर्नर-जनरल की स्वीकृति मिली।
इसलिए परीक्षा में विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1856 को लॉर्ड कैनिंग से जोड़ा जाता है।
इस कानून की दिशा में विधायी प्रक्रिया लॉर्ड डलहौजी के अंतिम कार्यकाल में शुरू हुई थी, लेकिन इसे अंतिम कानूनी स्वीकृति लॉर्ड कैनिंग के समय प्राप्त हुई।
भ्रम से बचें
कानून पारित होने के समय गवर्नर-जनरल — लॉर्ड कैनिंग।
पुनर्विवाह से जन्मी संतान की वैधता
1856 के अधिनियम का महत्वपूर्ण उद्देश्य केवल विधवा को पुनर्विवाह की अनुमति देना नहीं था, बल्कि ऐसे विवाह की कानूनी वैधता सुनिश्चित करना भी था।
किसी हिंदू विधवा के पुनर्विवाह से उत्पन्न संतान को केवल इस आधार पर अवैध नहीं माना जा सकता था कि उसकी माता पहले से विवाहित रही थी और उसके प्रथम पति की मृत्यु हो चुकी थी।
इस प्रकार कानून ने विधवा पुनर्विवाह और उससे बनने वाले नए परिवार को कानूनी संरक्षण प्रदान किया।
संपत्ति संबंधी महत्वपूर्ण प्रावधान
1856 का कानून विधवा के पुनर्विवाह को वैध बनाता था, लेकिन इसके साथ संपत्ति संबंधी कुछ शर्तें भी जुड़ी थीं।
सामान्यतः पुनर्विवाह करने पर विधवा के अपने मृत पति की संपत्ति में वे अधिकार समाप्त हो जाते थे जो उसे विधवा होने के कारण प्राप्त हुए थे।
इसलिए यह समझना आवश्यक है कि 1856 के अधिनियम ने पुनर्विवाह की कानूनी बाधा हटाई, लेकिन आधुनिक समय जैसी पूर्ण संपत्ति-समानता की व्यवस्था उस समय स्थापित नहीं हुई थी।
विष्णुशास्त्री पंडित
पश्चिमी भारत में विधवा पुनर्विवाह के प्रचार में विष्णुशास्त्री पंडित की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
उन्होंने महाराष्ट्र में विधवा पुनर्विवाह को सामाजिक स्वीकृति दिलाने के लिए सक्रिय अभियान चलाया और इस उद्देश्य से विधवा पुनर्विवाह संघ से जुड़ा संगठनात्मक प्रयास किया।
प्रतियोगी परीक्षाओं में इस संगठन की स्थापना को सामान्यतः 1866 ई. में महाराष्ट्र से जोड़ा जाता है।
इस संगठन का उद्देश्य विधवा पुनर्विवाह को प्रोत्साहित करना, उससे जुड़ी सामाजिक रूढ़ियों का विरोध करना और ऐसे विवाहों के लिए सामाजिक समर्थन तैयार करना था।
याद रखें
विधवा पुनर्विवाह संघ — विष्णुशास्त्री पंडित — 1866 ई. — महाराष्ट्र।
धोंडो केशव कर्वे
धोंडो केशव कर्वे महाराष्ट्र के प्रमुख समाज सुधारक थे। उन्होंने विधवा पुनर्विवाह, महिला शिक्षा और महिलाओं की सामाजिक स्थिति सुधारने के लिए जीवनभर कार्य किया।
कर्वे केवल विधवा पुनर्विवाह के समर्थक ही नहीं थे, बल्कि उन्होंने स्वयं भी एक विधवा से विवाह करके अपने सुधारवादी विचारों को व्यक्तिगत जीवन में अपनाया।
आगे उनका ध्यान विशेष रूप से विधवाओं और महिलाओं की शिक्षा तथा आर्थिक आत्मनिर्भरता पर केंद्रित हुआ।
उनके लंबे सामाजिक और शैक्षणिक योगदान के कारण उन्हें महर्षि कर्वे के नाम से भी जाना जाता है।
विधवा आश्रम की स्थापना
1896 ई. में धोंडो केशव कर्वे ने पुणे के निकट हिंगणे में विधवाओं के लिए आश्रम स्थापित किया।
इस संस्था का उद्देश्य विधवाओं को केवल आश्रय देना नहीं था, बल्कि उन्हें शिक्षा और प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भर बनाना भी था।
इस प्रयास ने विधवा कल्याण को केवल पुनर्विवाह तक सीमित न रखकर शिक्षा और महिला सशक्तिकरण से जोड़ दिया।
परीक्षा के लिए
1896 — हिंगणे, पुणे — विधवा आश्रम — धोंडो केशव कर्वे।
महिला शिक्षा में कर्वे का योगदान
धोंडो केशव कर्वे का सामाजिक सुधार कार्यक्रम आगे विधवा पुनर्विवाह से बढ़कर व्यापक महिला शिक्षा आंदोलन में परिवर्तित हुआ।
उनका विश्वास था कि महिलाओं की वास्तविक उन्नति केवल विवाह संबंधी सुधारों से नहीं, बल्कि शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता से संभव है।
आगे उन्होंने महिलाओं के लिए उच्च शिक्षा संस्थानों की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और भारत में महिला विश्वविद्यालय की स्थापना की दिशा में भी अग्रणी कार्य किया।
1958 ई. में उनके सामाजिक और शैक्षणिक योगदान के लिए उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
प्रमुख समाज सुधारक — एक नजर में
| समाज सुधारक | प्रमुख योगदान |
|---|---|
| ईश्वरचंद्र विद्यासागर | हिंदू विधवा पुनर्विवाह को कानूनी मान्यता दिलाने के लिए प्रमुख अभियान |
| विष्णुशास्त्री पंडित | महाराष्ट्र में विधवा पुनर्विवाह आंदोलन और विधवा पुनर्विवाह संघ |
| धोंडो केशव कर्वे | विधवा पुनर्विवाह, विधवा आश्रम और महिला शिक्षा |
महत्वपूर्ण तिथियाँ
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1856 | हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम |
| 25 जुलाई 1856 | अधिनियम को गवर्नर-जनरल की स्वीकृति |
| 1866 | विष्णुशास्त्री पंडित से संबंधित विधवा पुनर्विवाह संघ |
| 1896 | हिंगणे, पुणे में कर्वे द्वारा विधवा आश्रम |
| 1958 | धोंडो केशव कर्वे को भारत रत्न |
परीक्षा में भ्रमित करने वाले तथ्य
हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम — 1856 ई.
इसे अधिनियम XV, 1856 कहा जाता है; “नियम XV” लिखना सही नहीं है।
इस कानून के समय भारत के गवर्नर-जनरल लॉर्ड कैनिंग थे।
विधवा पुनर्विवाह कानून के लिए सबसे प्रमुख भारतीय समाज सुधारक ईश्वरचंद्र विद्यासागर थे।
कानून ने विधवा पुनर्विवाह को वैध किया और ऐसे विवाह से जन्मी संतान की कानूनी वैधता सुनिश्चित की।
विष्णुशास्त्री पंडित पश्चिमी भारत में विधवा पुनर्विवाह आंदोलन से जुड़े प्रमुख सुधारक थे।
प्रतियोगी परीक्षाओं में 1866 — विधवा पुनर्विवाह संघ — विष्णुशास्त्री पंडित याद रखें।
डी. के. कर्वे — 1896 — हिंगणे, पुणे — विधवा आश्रम।
एक नजर में
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| कानून | हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम |
| वर्ष | 1856 ई. |
| अधिनियम संख्या | XV |
| गवर्नर-जनरल | लॉर्ड कैनिंग |
| प्रमुख भारतीय सुधारक | ईश्वरचंद्र विद्यासागर |
| मुख्य परिणाम | हिंदू विधवा पुनर्विवाह को कानूनी मान्यता |
| विष्णुशास्त्री पंडित | महाराष्ट्र में विधवा पुनर्विवाह आंदोलन के प्रमुख नेता |
| विधवा पुनर्विवाह संघ | 1866 ई. |
| विधवा आश्रम | 1896 ई., हिंगणे, पुणे |
| संस्थापक | धोंडो केशव कर्वे |
अंतिम त्वरित पुनरावृत्ति
ईश्वरचंद्र विद्यासागर हिंदू विधवा पुनर्विवाह आंदोलन के सबसे प्रमुख भारतीय समाज सुधारकों में थे।
उनके प्रयासों से विधवा पुनर्विवाह के पक्ष में सामाजिक और विधायी वातावरण तैयार हुआ।
1856 ई. में हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित हुआ।
इस कानून का क्रमांक अधिनियम XV, 1856 था।
इस कानून के समय भारत के गवर्नर-जनरल लॉर्ड कैनिंग थे।
इस अधिनियम ने हिंदू विधवा के पुनर्विवाह को कानूनी मान्यता प्रदान की।
पुनर्विवाह से जन्म लेने वाली संतान को भी कानूनी रूप से वैध माना गया।
पुनर्विवाह करने पर विधवा के मृत पति की संपत्ति से जुड़े कुछ अधिकार सामान्यतः समाप्त हो जाते थे।
विष्णुशास्त्री पंडित ने महाराष्ट्र में विधवा पुनर्विवाह को प्रोत्साहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
प्रतियोगी परीक्षाओं में 1866 ई. — विधवा पुनर्विवाह संघ — विष्णुशास्त्री पंडित महत्वपूर्ण है।
धोंडो केशव कर्वे विधवा पुनर्विवाह और महिला शिक्षा के प्रमुख समर्थक थे।
1896 ई. में उन्होंने पुणे के निकट हिंगणे में विधवा आश्रम स्थापित किया।
कर्वे ने आगे महिला शिक्षा के विस्तार में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया और उन्हें महर्षि कर्वे के नाम से जाना गया।
परीक्षा के लिए प्रमुख क्रम है — ईश्वरचंद्र विद्यासागर → विधवा पुनर्विवाह आंदोलन → 1856 का अधिनियम XV → लॉर्ड कैनिंग → विष्णुशास्त्री पंडित → डी. के. कर्वे।