सिंधु सभ्यता एवं वैदिक काल
हड़प्पाई नगरों से उत्तर वैदिक समाज तक
सिंधु या हड़प्पा सभ्यता
सिंधु सभ्यता को हड़प्पा सभ्यता भी कहा जाता है, क्योंकि इस सभ्यता का सबसे पहले उत्खनित प्रमुख स्थल हड़प्पा था। यह भारतीय उपमहाद्वीप की प्रथम विकसित नगरीय सभ्यता थी।
इस सभ्यता के नगर सुव्यवस्थित सड़कों, जल-निकासी व्यवस्था, पक्की ईंटों, मानकीकृत बाटों, हस्तशिल्प, मुहरों और दूर-दराज के व्यापार के लिए प्रसिद्ध थे।
काल एवं रेडियोकार्बन पद्धति
हड़प्पा सभ्यता का काल
परिपक्व हड़प्पा सभ्यता का काल सामान्यतः लगभग 2600 ईसा पूर्व से 1900 ईसा पूर्व माना जाता है। इसके पहले प्रारंभिक हड़प्पा तथा बाद में उत्तर हड़प्पा चरण विकसित हुए।
पुरातात्विक जैविक पदार्थों की आयु ज्ञात करने के लिए कार्बन-14 अथवा रेडियोकार्बन पद्धति का उपयोग किया जाता है।
इस पद्धति के विकास का श्रेय अमेरिकी वैज्ञानिक विलार्ड एफ. लिब्बी और उनकी टीम को दिया जाता है। इस कार्य के लिए लिब्बी को 1960 में रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार मिला।
सभ्यता की खोज
हड़प्पा, मोहनजोदड़ो और जॉन मार्शल
दयाराम साहनी ने 1921 ईस्वी में हड़प्पा में उत्खनन किया।
राखालदास बनर्जी ने 1922 ईस्वी में मोहनजोदड़ो के अवशेषों की पहचान और उत्खनन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सर जॉन मार्शल ने 1924 ईस्वी में इस प्राचीन विकसित सभ्यता की खोज की औपचारिक घोषणा की।
सिंधु लिपि अभी पढ़ी नहीं जा सकी है, इसलिए यह सभ्यता आद्य-ऐतिहासिक सभ्यता कहलाती है। तांबा और कांसा प्रमुख धातुएँ होने के कारण इसे कांस्ययुगीन सभ्यता भी कहा जाता है।
नगरीय सभ्यता
नगर-योजना
हड़प्पा सभ्यता एक विकसित नगरीय सभ्यता थी। इसके नगर योजनाबद्ध रूप से बसाए गए थे।
सड़कें और गलियाँ प्रायः एक-दूसरे को लगभग समकोण पर काटती थीं। इसे जालीनुमा नगर-योजना कहा जाता है।
घरों के द्वार सामान्यतः बड़ी मुख्य सड़क की बजाय गलियों की ओर खुलते थे, हालाँकि अलग-अलग नगरों की गृह-योजना में अंतर भी मिलता है।
प्रमुख बड़े स्थल
राखीगढ़ी और मोहनजोदड़ो
मोहनजोदड़ो सिंधु सभ्यता के सबसे विशाल और महत्वपूर्ण नगरों में से एक था।
हरियाणा के हिसार जिले में स्थित राखीगढ़ी भारत का सबसे बड़ा ज्ञात हड़प्पाई स्थल है और पूरे हड़प्पाई क्षेत्र के सबसे बड़े नगरों में गिना जाता है।
राखीगढ़ी की पहचान और प्रारंभिक सर्वेक्षण में सूरजभान सहित कई पुरातत्वविदों का योगदान रहा।
लोथल और समुद्री व्यापार
गोदी एवं बंदरगाह
गुजरात का लोथल हड़प्पा सभ्यता का महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक केंद्र था। यहाँ मिली विशाल ईंट-निर्मित संरचना को सामान्यतः गोदी माना जाता है।
सुत्कागेन-दोर मकरान तट के निकट स्थित हड़प्पाई व्यापारिक चौकी थी।
सुरकोटड़ा और सुत्कागेन-दोर दो अलग-अलग स्थल हैं। सुरकोटड़ा गुजरात के कच्छ क्षेत्र में स्थित है।
कालीबंगन
जुता हुआ खेत और अग्निवेदियाँ
राजस्थान का कालीबंगन महत्वपूर्ण हड़प्पाई स्थल है। यहाँ जुते हुए खेत के प्रमाण मिले हैं।
खेत में दो दिशाओं में हल की रेखाएँ मिली हैं, जिससे मिश्रित कृषि की संभावना दिखाई देती है।
कालीबंगन से अग्निवेदियों जैसी संरचनाएँ भी मिली हैं।
कालीबंगन के निचले नगर के चारों ओर भी रक्षा-दीवार थी।
कालीबंगन का सामान्य अर्थ “काली चूड़ियाँ” बताया जाता है।
महान स्नानागार
मोहनजोदड़ो
मोहनजोदड़ो से प्राप्त महान स्नानागार हड़प्पा सभ्यता की सबसे प्रसिद्ध सार्वजनिक संरचनाओं में से एक है।
इसके बीच में आयताकार स्नान-कुंड था और उसमें उतरने के लिए सीढ़ियाँ बनी थीं। जल को रिसने से रोकने के लिए विशेष व्यवस्था की गई थी।
नर्तकी और हस्तशिल्प
कांस्य कला एवं मनका निर्माण
मोहनजोदड़ो से प्रसिद्ध कांस्य नर्तकी की मूर्ति प्राप्त हुई है।
यह मूर्ति उन्नत धातु-ढलाई तकनीक का प्रमाण है।
लोथल और चन्हूदड़ो मनका निर्माण के महत्वपूर्ण केंद्र थे। यहाँ अर्ध-मूल्यवान पत्थरों, शंख और अन्य पदार्थों से मनके बनाए जाते थे।
सिंधु लिपि
अपठित लेखन प्रणाली
सिंधु सभ्यता की लिपि अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है। इसमें अनेक चित्र-सदृश और संकेतात्मक चिह्न हैं।
अधिकांश छोटे अभिलेखों में लेखन की दिशा दाएँ से बाएँ मानी जाती है।
कुछ बहु-पंक्तीय लेखों में दिशा बदलने के संकेत मिले हैं, पर इसे सभी अभिलेखों की निश्चित लेखन-पद्धति नहीं माना जाता।
कृषि
गेहूँ, जौ, चावल और हल
हड़प्पा सभ्यता की मुख्य फसलों में गेहूँ और जौ प्रमुख थे।
लोथल और रंगपुर से चावल के प्रमाण मिले हैं। इन स्थलों को पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में चावल के सबसे पहले प्रयोग का स्थल नहीं माना जाता।
हरियाणा के बनावली से मिट्टी का बना हल का नमूना मिला है।
घोड़े के प्रमाण
सुरकोटड़ा
सुरकोटड़ा से मिले कुछ अश्ववंशी पशुओं के अस्थि-अवशेषों को कुछ विद्वानों ने घोड़े से संबंधित माना है।
इन अवशेषों की पहचान को लेकर विद्वानों में मतभेद है। इसलिए हड़प्पा सभ्यता में घोड़े की व्यापक उपस्थिति सिद्ध नहीं मानी जाती।
बाट, यातायात और व्यापार
मानकीकृत व्यवस्था
हड़प्पाई बाटों में मानकीकरण मिलता है। छोटे बाटों में 1, 2, 4, 8, 16, 32 और 64 जैसे अनुपात दिखाई देते हैं।
स्थल-यातायात के लिए बैलगाड़ी जैसी पहिएदार गाड़ियों का उपयोग होता था।
जल और समुद्री मार्ग भी व्यापार के लिए महत्वपूर्ण थे।
मेसोपोटामिया के अभिलेखों में मेलुह्हा नामक क्षेत्र का उल्लेख है, जिसे सामान्यतः हड़प्पाई क्षेत्र से जोड़ा जाता है।
वस्त्र एवं मिट्टी के बर्तन
दैनिक जीवन
हड़प्पाई लोग सूती और ऊनी वस्त्रों से परिचित थे। कपास के प्रारंभिक उपयोग के महत्वपूर्ण प्रमाण इस सभ्यता से मिले हैं।
लाल मिट्टी के बर्तनों पर काले रंग से आकृतियाँ और डिजाइन बनाए जाते थे।
आग में पकी हुई मिट्टी से बनी वस्तुओं को टेराकोटा कहा जाता है।
हड़प्पाई धर्म
धार्मिक प्रतीक
हड़प्पा स्थलों से स्त्री मृणमूर्तियाँ, पशु-मुहरें, वृक्ष-आकृतियाँ और विभिन्न धार्मिक प्रतीक मिले हैं।
कुछ स्त्री मूर्तियों को उर्वरता अथवा मातृदेवी से जोड़ा गया है, पर इससे हड़प्पा समाज का मातृसत्तात्मक होना सिद्ध नहीं होता।
एक प्रसिद्ध सींगयुक्त आकृति वाली मुहर को कुछ विद्वानों ने पशुपति अथवा शिव के प्रारंभिक रूप से जोड़ा है। इस पहचान पर विद्वानों में मतभेद है।
स्वस्तिक चिह्न भी हड़प्पा सभ्यता में मिलता है, पर यह प्रतीक प्राचीन विश्व के अन्य क्षेत्रों में भी मिलता था।
अब तक किसी हड़प्पाई भवन को सर्वसम्मति से मंदिर नहीं माना गया है।
कुबड़ा बैल मुहरों पर बहुत प्रमुखता से दिखाई देता है। इससे उसका सांस्कृतिक महत्व स्पष्ट होता है।
कुछ पुराने दावे
सही तथ्य
सिंधु सभ्यता के लोगों की निश्चित जातीय या नस्लीय पहचान ज्ञात नहीं है। उन्हें सीधे द्रविड़ या भूमध्यसागरीय नस्ल कहना प्रमाणित तथ्य नहीं है।
सिंधु सभ्यता की शासन-व्यवस्था भी निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है। व्यापारी वर्ग के शासन की धारणा केवल एक अनुमान है।
पर्दा-प्रथा और वेश्यावृत्ति के निश्चित प्रचलन का प्रमाण हड़प्पा पुरातत्व से नहीं मिलता।
हड़प्पाई लोगों को भाले, चाकू, कुल्हाड़ी और तीर जैसे हथियार ज्ञात थे, लेकिन लंबी तलवार उनके सामान्य हथियारों में प्रमुख नहीं दिखाई देती।
प्रमुख हड़प्पाई स्थल
एक नज़र में
| स्थल | स्थान / नदी | मुख्य तथ्य |
|---|---|---|
| हड़प्पा | रावी, पाकिस्तान | दयाराम साहनी, 1921 |
| मोहनजोदड़ो | सिंधु, पाकिस्तान | महान स्नानागार, कांस्य नर्तकी |
| कालीबंगन | राजस्थान, घग्गर क्षेत्र | जुता हुआ खेत, अग्निवेदियाँ |
| लोथल | गुजरात | गोदी, मनका निर्माण, समुद्री व्यापार |
| राखीगढ़ी | हरियाणा | भारत का सबसे बड़ा ज्ञात हड़प्पाई स्थल |
| धोलावीरा | कच्छ, गुजरात | विशाल जल-संचयन व्यवस्था |
| बनावली | हरियाणा | मिट्टी का हल |
| चन्हूदड़ो | पाकिस्तान | मनका निर्माण |
| सुरकोटड़ा | कच्छ, गुजरात | घोड़े से जोड़े गए अस्थि-अवशेष |
ऋग्वैदिक एवं उत्तर वैदिक काल
राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था और धर्म
वैदिक काल का विभाजन
दो प्रमुख चरण
वैदिक काल को सामान्यतः दो भागों में बाँटा जाता है — ऋग्वैदिक या प्रारंभिक वैदिक काल तथा उत्तर वैदिक काल।
ऋग्वैदिक काल लगभग 1500–1000 ईसा पूर्व और उत्तर वैदिक काल लगभग 1000–600 ईसा पूर्व माना जाता है।
आर्य एवं उनका प्रारंभिक क्षेत्र
सप्तसिंधु क्षेत्र
प्रारंभिक वैदिक संस्कृति का प्रमुख क्षेत्र उत्तर-पश्चिमी भारतीय उपमहाद्वीप था, जिसमें पंजाब और उससे लगे अफगानिस्तान के क्षेत्र शामिल थे।
आर्य शब्द को आधुनिक इतिहास में मुख्यतः भाषायी-सांस्कृतिक समूह के रूप में देखा जाता है, न कि किसी निश्चित जैविक नस्ल के रूप में।
उनकी भाषा वैदिक संस्कृत थी।
आर्यों के मूल निवास के विषय में विभिन्न मत रहे हैं। आधुनिक शोध में इंडो-यूरोपीय भाषी समुदायों की पृष्ठभूमि को यूरेशियाई स्टेपी क्षेत्र से जोड़ने वाला मत प्रमुख है।
ऋग्वैदिक जीवन
ग्रामीण एवं पशुपालक समाज
प्रारंभिक वैदिक समाज मुख्यतः ग्रामीण और पशुपालक था। कृषि भी की जाती थी, लेकिन पशुधन का विशेष महत्व था।
गाय आर्थिक संपत्ति का प्रमुख प्रतीक थी, जबकि घोड़ा युद्ध, रथ और प्रतिष्ठा के लिए महत्वपूर्ण था।
संगीत, रथ-दौड़, घुड़दौड़ और पासे का खेल मनोरंजन के प्रमुख साधन थे।
ऋग्वेद के अक्ष सूक्त में जुए की लत और उसके दुष्परिणाम का वर्णन मिलता है।
ऋग्वैदिक प्रशासन
कुल से जन तक
ऋग्वैदिक समाज में कुल → ग्राम → विश → जन जैसी सामाजिक-राजनीतिक इकाइयाँ मिलती हैं।
ग्राम का प्रमुख ग्रामणी, विश का प्रमुख विशपति और जन का प्रमुख राजन् कहलाता था।
पुरोहित और सेनानी राजा के प्रमुख सहयोगी थे।
स्पश गुप्तचर अथवा निगरानी से संबंधित व्यक्ति था।
सभा और समिति
जनजातीय संस्थाएँ
सभा और समिति ऋग्वैदिक काल की महत्वपूर्ण संस्थाएँ थीं।
सभा अपेक्षाकृत छोटे और प्रतिष्ठित समूह की संस्था थी, जबकि समिति का आधार अधिक व्यापक था।
दोनों संस्थाएँ राजा को सलाह देती थीं।
वैदिक साहित्य में स्त्रियों की इन संस्थाओं में भागीदारी के संकेत भी मिलते हैं।
गविष्टि और दशराज्ञ युद्ध
ऋग्वैदिक युद्ध
ऋग्वेद में गविष्टि का मूल अर्थ गायों की खोज है और इसका प्रयोग युद्ध या संघर्ष के अर्थ में भी हुआ।
ऋग्वेद के सातवें मंडल में दशराज्ञ युद्ध का उल्लेख है।
यह युद्ध परुष्णी नदी, अर्थात वर्तमान रावी के तट पर राजा सुदास और दस जनों के संघ के बीच हुआ। सुदास विजयी हुआ।
ऋग्वैदिक समाज
परिवार एवं वर्ण
ऋग्वैदिक समाज मुख्यतः पितृप्रधान था। परिवार या कुल समाज की सबसे छोटी इकाई था।
प्रारंभिक चरण में सामाजिक वर्गीकरण बाद के समय जितना कठोर नहीं था।
ऋग्वेद के दसवें मंडल के पुरुष सूक्त में ब्राह्मण, राजन्य, वैश्य और शूद्र चार वर्णों का उल्लेख मिलता है।
चार-वर्ण व्यवस्था का अधिक कठोर और जन्म-आधारित रूप उत्तर वैदिक काल में विकसित हुआ।
ऋग्वैदिक स्त्रियाँ
शिक्षा और धार्मिक जीवन
प्रारंभिक वैदिक समाज में स्त्रियाँ यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेती थीं।
बाल विवाह और पर्दा-प्रथा के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलते।
लोपामुद्रा, घोषा, अपाला और विश्ववारा जैसी स्त्री ऋषियों का उल्लेख मिलता है।
गार्गी उत्तर वैदिक-उपनिषदिक काल की प्रसिद्ध विदुषी थीं, जिन्होंने याज्ञवल्क्य से दार्शनिक वाद-विवाद किया।
अमाजू शब्द ऐसी स्त्री के लिए प्रयुक्त हुआ है जो विवाह किए बिना पिता के घर रहती थी।
सोम, अग्नि और इंद्र
प्रमुख धार्मिक तत्व
सोम वैदिक यज्ञों में प्रयुक्त महत्वपूर्ण पवित्र पेय था। ऋग्वेद का नौवाँ मंडल सोम पवमान को समर्पित है।
अग्नि को मनुष्य और देवताओं के बीच मध्यस्थ माना गया, क्योंकि यज्ञ की आहुति अग्नि के माध्यम से देवताओं तक पहुँचती मानी जाती थी।
इंद्र ऋग्वेद के सबसे प्रमुख देवताओं में थे।
सरस्वती ऋग्वेद में अत्यंत महिमामंडित नदी है, जबकि सिंधु ऋग्वैदिक भूगोल की सबसे महत्वपूर्ण नदियों में से एक थी।
धातु, व्यापार और विनिमय
ऋग्वैदिक अर्थव्यवस्था
ऋग्वेद में अयस शब्द मिलता है, जो प्रारंभिक काल में तांबा या कांसा जैसी धातुओं से संबंधित माना जाता है।
लोहा उत्तर वैदिक काल में अधिक स्पष्ट रूप से श्याम अयस या कृष्ण अयस के रूप में मिलता है।
वस्तु-विनिमय महत्वपूर्ण था। गाय मूल्य और संपत्ति के प्रमुख मानकों में थी।
निष्क मूल्यवान स्वर्ण वस्तु अथवा मूल्य-इकाई के रूप में प्रयुक्त होता था; यह आधुनिक प्रकार का नियमित ढला सिक्का नहीं था।
पणि शब्द धन, पशुधन और व्यापार से जुड़े समूहों के संदर्भ में मिलता है।
उत्तर वैदिक समाज एवं संस्कृति
राजसत्ता, वर्ण व्यवस्था, कृषि, दर्शन और धार्मिक परिवर्तन
उत्तर वैदिक काल
1000–600 ईसा पूर्व
लगभग 1000–600 ईसा पूर्व का समय उत्तर वैदिक काल कहलाता है। इस काल में वैदिक संस्कृति का विस्तार पंजाब और पश्चिमी क्षेत्रों से गंगा-यमुना के मैदान की ओर हुआ।
इस समय जनजातीय संगठन की जगह बड़े जनपदों और क्षेत्रीय राज्यों का विकास होने लगा।
कुरु और पांचाल उत्तर वैदिक काल के प्रमुख राजनीतिक और सांस्कृतिक केंद्र बने।
प्रमुख देवताओं में परिवर्तन
प्रजापति, विष्णु और रुद्र
उत्तर वैदिक काल में ऋग्वैदिक देवताओं इंद्र और वरुण का महत्व अपेक्षाकृत कम हुआ और प्रजापति प्रमुख देवता के रूप में उभरे।
विष्णु और रुद्र का महत्व भी बढ़ा। बाद की धार्मिक परंपराओं में रुद्र का संबंध शिव से और अधिक स्पष्ट हुआ।
विष्णु के तीन पगों का उल्लेख ऋग्वेद में पहले से मिलता है। उत्तर वैदिक और बाद के साहित्य में विष्णु का धार्मिक महत्व और अधिक विकसित हुआ।
याद रखें
विष्णु के तीन पग — ऋग्वेद में भी उल्लेख।
उत्तर वैदिक काल — विष्णु का बढ़ता महत्व।
राजसत्ता और बड़े यज्ञ
राजसूय, अश्वमेध और वाजपेय
उत्तर वैदिक काल में राजा की शक्ति और प्रतिष्ठा बढ़ी। राजसत्ता से जुड़े बड़े धार्मिक यज्ञों का महत्व भी बढ़ गया।
राजसूय यज्ञ राजा के अभिषेक और राजकीय प्रतिष्ठा से संबंधित था।
अश्वमेध यज्ञ राजा की राजनीतिक और क्षेत्रीय प्रभुता प्रदर्शित करने वाला महत्वपूर्ण यज्ञ था।
वाजपेय यज्ञ भी राजकीय शक्ति और प्रतिष्ठा से जुड़ा महत्वपूर्ण अनुष्ठान था।
वर्ण व्यवस्था
जन्म-आधारित व्यवस्था का विकास
उत्तर वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था पहले की तुलना में अधिक स्पष्ट और कठोर हुई।
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के सामाजिक कर्तव्यों में अधिक स्पष्ट अंतर किया जाने लगा।
वर्ण का निर्धारण धीरे-धीरे व्यवसाय के साथ जन्म से अधिक जुड़ने लगा।
ब्राह्मणों और क्षत्रियों की सामाजिक स्थिति विशेष रूप से मजबूत हुई।
गोत्र व्यवस्था
वंशीय पहचान
उत्तर वैदिक काल में गोत्र व्यवस्था अधिक स्पष्ट और महत्वपूर्ण हुई।
गोत्र का संबंध किसी प्राचीन ऋषि से वंशीय पहचान स्थापित करने से था।
बाद में एक ही गोत्र के स्त्री-पुरुष के विवाह पर निषेध की परंपरा विकसित हुई।
कृषि और हल
कृषि का विस्तार
उत्तर वैदिक काल में कृषि अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार बन गई।
जंगल साफ करके नई कृषि भूमि तैयार की गई और बड़े हलों का उपयोग बढ़ा।
वैदिक साहित्य में हल के लिए सीर/सीरा जैसे शब्द और हल से बनी रेखा के लिए सीता शब्द मिलता है।
गेहूँ और जौ के साथ चावल का महत्व भी बढ़ा।
निष्क और शतमान
मूल्य और भार की इकाइयाँ
उत्तर वैदिक साहित्य में निष्क और शतमान जैसे शब्द आर्थिक मूल्य और भार से संबंधित संदर्भों में मिलते हैं।
इन्हें आधुनिक अर्थ में नियमित ढले हुए सिक्के नहीं माना जाता।
भारत में आहत सिक्कों का प्रचलन बाद के काल में, लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व से अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
लोहे का बढ़ता प्रयोग
श्याम अयस और कृष्ण अयस
उत्तर वैदिक काल में लोहे का प्रयोग बढ़ने लगा। वैदिक साहित्य में इसके लिए श्याम अयस और कृष्ण अयस जैसे शब्द मिलते हैं।
लोहे के औजारों ने जंगल साफ करने और कृषि भूमि के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
गंगा-यमुना क्षेत्र में कृषि और स्थायी बस्तियों के विस्तार में लोहे की तकनीक का विशेष महत्व था।
राजनीतिक परिवर्तन
जन से जनपद
उत्तर वैदिक काल में छोटे जनजातीय समूहों के स्थान पर बड़े क्षेत्रीय राज्यों का विकास होने लगा।
जन से जनपद की ओर परिवर्तन इसी समय अधिक स्पष्ट दिखाई देता है।
राजा की शक्ति बढ़ने के साथ सभा और समिति जैसी पुरानी जनजातीय संस्थाओं का प्रभाव अपेक्षाकृत कम हुआ।
रत्निन
राजा से जुड़े महत्वपूर्ण अधिकारी
उत्तर वैदिक ग्रंथों में राजा से जुड़े महत्वपूर्ण व्यक्तियों को रत्निन कहा गया है।
इनमें पुरोहित, सेनानी, ग्रामणी, सूत और रथकार जैसे पद शामिल थे।
इनकी संख्या सामान्यतः लगभग 12 बताई जाती है, हालाँकि विभिन्न वैदिक ग्रंथों की सूचियों में कुछ अंतर मिलता है।
स्त्रियों की स्थिति
उत्तर वैदिक समाज
उत्तर वैदिक काल में स्त्रियों की सामाजिक और सार्वजनिक स्थिति में प्रारंभिक वैदिक काल की तुलना में कुछ गिरावट दिखाई देती है।
सभा और समिति जैसी राजनीतिक संस्थाओं में उनकी भूमिका कम हुई।
फिर भी गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषी स्त्रियाँ उपनिषदिक दार्शनिक परंपरा में महत्वपूर्ण स्थान रखती थीं।
गायत्री मंत्र
सवितृ देवता
प्रसिद्ध गायत्री मंत्र ऋग्वेद के तीसरे मंडल में मिलता है।
यह मंत्र सवितृ देवता को समर्पित है और विश्वामित्र-परिवार से संबंधित ऋग्वैदिक परंपरा का हिस्सा है।
गायत्री मंत्र की रचना का उद्देश्य “लोगों को आर्य बनाना” नहीं था। इस प्रकार का दावा वैदिक ग्रंथों से प्रमाणित नहीं है।
सत्यमेव जयते
मुण्डक उपनिषद
“सत्यमेव जयते” मुण्डक उपनिषद से लिया गया है।
इसका सामान्य अर्थ है — सत्य की ही विजय होती है।
भारत के राजचिह्न के नीचे भी सत्यमेव जयते अंकित है।
सांख्य दर्शन
प्रकृति और पुरुष
सांख्य भारतीय दर्शन की प्राचीनतम दार्शनिक परंपराओं में से एक है। इसका पारंपरिक संबंध महर्षि कपिल से जोड़ा जाता है।
शास्त्रीय सांख्य दर्शन में 25 तत्त्व माने जाते हैं।
इनमें प्रकृति मूल भौतिक तत्त्व है और पुरुष चेतन तत्त्व है।
श्राद्ध परंपरा
धार्मिक परंपरा
श्राद्ध और पितृ-कर्म की परंपरा वैदिक तथा उत्तर वैदिक धार्मिक जीवन में विकसित हुई।
निमि द्वारा श्राद्ध की शुरुआत किए जाने की कथा बाद के धार्मिक और पुराणिक साहित्य में मिलती है। इसे उत्तर वैदिक काल की किसी एक ऐतिहासिक घटना के रूप में नहीं माना जाता।
पकी ईंटें और कौशांबी
नगरों का विकास
उत्तर वैदिक काल के बाद गंगा घाटी में कौशांबी जैसे महत्वपूर्ण नगर विकसित हुए।
पकी ईंटों का प्रयोग भारत में कौशांबी से बहुत पहले हड़प्पा सभ्यता में हो चुका था।
इसलिए कौशांबी को भारत में पकी ईंटों के प्रथम प्रयोग का स्थल नहीं माना जाता।
रामायण और महाभारत
दो प्रमुख महाकाव्य
भारतीय परंपरा के दो प्रमुख महाकाव्य रामायण और महाभारत हैं।
रामायण का पारंपरिक संबंध महर्षि वाल्मीकि से और महाभारत का संबंध महर्षि वेदव्यास से जोड़ा जाता है।
दोनों ग्रंथों का विकास लंबे समय तक हुआ और इनमें अलग-अलग काल की सामग्री जुड़ती गई।
महाभारत का विकास
जय से महाभारत तक
भारतीय परंपरा में महाभारत के प्रारंभिक रूप को “जय” नाम से जोड़ा जाता है।
बाद की परंपरा में इसके विस्तृत रूप को भारत और अंततः महाभारत कहा गया।
यह विकास-क्रम पारंपरिक विवरण पर आधारित है; आज उपलब्ध महाभारत एक लंबे साहित्यिक विकास का परिणाम है।
महाभारत लगभग एक लाख श्लोकों वाली विशाल रचना है और इसे विश्व के सबसे लंबे महाकाव्यों में गिना जाता है।
उत्तर वैदिक काल — एक नज़र में
मुख्य परिवर्तन
| क्षेत्र | उत्तर वैदिक काल की प्रमुख विशेषता |
|---|---|
| राजनीति | जन से जनपद की ओर विकास; राजा की शक्ति में वृद्धि |
| प्रमुख क्षेत्र | कुरु और पांचाल |
| धर्म | प्रजापति का बढ़ता महत्व; विष्णु और रुद्र का उभार |
| यज्ञ | राजसूय, अश्वमेध और वाजपेय |
| वर्ण | अधिक जन्म-आधारित और कठोर व्यवस्था |
| कृषि | कृषि विस्तार और लोहे के औजारों का बढ़ता प्रयोग |
| धातु | श्याम अयस / कृष्ण अयस — लोहा |
| अर्थव्यवस्था | निष्क और शतमान जैसे मूल्य/भार संबंधी शब्द |
| समाज | गोत्र व्यवस्था अधिक स्पष्ट |
| स्त्रियाँ | सार्वजनिक स्थिति में अपेक्षाकृत कमी; गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषियाँ |
महत्वपूर्ण अंतर
ऋग्वैदिक और उत्तर वैदिक काल
| आधार | ऋग्वैदिक काल | उत्तर वैदिक काल |
|---|---|---|
| क्षेत्र | सप्तसिंधु और उत्तर-पश्चिम | गंगा-यमुना क्षेत्र तक विस्तार |
| अर्थव्यवस्था | पशुपालन अधिक महत्वपूर्ण | कृषि अधिक महत्वपूर्ण |
| राजनीति | जनजातीय संगठन | क्षेत्रीय राज्य और जनपद |
| राजा | सीमित जनजातीय प्रमुख | अधिक शक्तिशाली शासक |
| सभा-समिति | अधिक महत्वपूर्ण | महत्व में कमी |
| वर्ण व्यवस्था | कम कठोर | अधिक जन्म-आधारित |
| देवता | इंद्र, अग्नि, वरुण | प्रजापति, विष्णु, रुद्र का बढ़ता महत्व |
| धातु | तांबा-कांसा प्रमुख | लोहे का बढ़ता प्रयोग |
⚡ अंतिम त्वरित पुनरावृत्ति
परिपक्व हड़प्पा सभ्यता — लगभग 2600–1900 ईसा पूर्व।
हड़प्पा — दयाराम साहनी — 1921।
मोहनजोदड़ो — राखालदास बनर्जी — 1922।
जॉन मार्शल — 1924 में सभ्यता की औपचारिक घोषणा।
राखीगढ़ी — भारत का सबसे बड़ा ज्ञात हड़प्पाई स्थल।
लोथल — समुद्री व्यापार और गोदी।
कालीबंगन — जुता हुआ खेत और अग्निवेदियाँ।
मोहनजोदड़ो — महान स्नानागार और कांस्य नर्तकी।
बनावली — मिट्टी का हल।
लोथल और चन्हूदड़ो — मनका निर्माण।
हड़प्पा लिपि — अपठित; अधिकांश लेख दाएँ से बाएँ।
मुख्य हड़प्पाई फसलें — गेहूँ और जौ।
मेलुह्हा — मेसोपोटामिया के अभिलेखों में हड़प्पाई क्षेत्र से जोड़ा गया नाम।
ऋग्वैदिक काल — लगभग 1500–1000 ईसा पूर्व।
उत्तर वैदिक काल — लगभग 1000–600 ईसा पूर्व।
दशराज्ञ युद्ध — ऋग्वेद का सातवाँ मंडल — परुष्णी — सुदास।
ऋग्वैदिक प्रमुख देवता — इंद्र।
उत्तर वैदिक काल — प्रजापति का बढ़ता महत्व।
विष्णु के तीन पग — ऋग्वेद में भी वर्णित।
राजसूय — राजकीय अभिषेक और प्रतिष्ठा।
अश्वमेध — राजनीतिक प्रभुता।
उत्तर वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था अधिक जन्म-आधारित हुई।
गोत्र व्यवस्था उत्तर वैदिक काल में अधिक स्पष्ट हुई।
श्याम अयस / कृष्ण अयस — लोहा।
निष्क और शतमान — मूल्य/भार से संबंधित; नियमित ढले सिक्के नहीं।
सत्यमेव जयते — मुण्डक उपनिषद।
गायत्री मंत्र — ऋग्वेद का तीसरा मंडल — सवितृ देवता।
सांख्य — 25 तत्त्व — प्रकृति और पुरुष प्रमुख आधार।
रामायण और महाभारत — भारत के दो प्रमुख महाकाव्य।
महाभारत के प्रारंभिक रूप की पारंपरिक संज्ञा — जय।