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हुमायूँ (1530–1540 एवं 1555–1556 ई.)
MUGHAL EMPIRE — HUMAYUN

हुमायूँ (1530–1540 एवं 1555–1556 ई.)

उत्तराधिकार, शेर खाँ से संघर्ष, निर्वासन और मुगल सत्ता की पुनर्स्थापना

हुमायूँ का परिचय

नसीरुद्दीन मुहम्मद हुमायूँ बाबर का पुत्र और भारत का दूसरा मुगल सम्राट था। उसका शासन दो चरणों में रहा—1530–1540 ई. और पुनः 1555–1556 ई.। शेर खाँ सूरी से पराजित होकर उसे भारत छोड़ना पड़ा, लेकिन लगभग 15 वर्षों बाद उसने मुगल सत्ता पुनः प्राप्त की। उसके जीवन में चौसा और कन्नौज की पराजय, फारस में शरण, अकबर का जन्म, काबुल-कंधार की पुनर्प्राप्ति और 1555 में दिल्ली की वापसी प्रमुख घटनाएँ थीं।

01

हुमायूँ का राज्यारोहण

Accession — 1530 CE

बाबर की मृत्यु के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र नसीरुद्दीन मुहम्मद हुमायूँ 29 दिसंबर 1530 ई. को आगरा में मुगल सिंहासन पर बैठा। उस समय उसकी आयु लगभग 22 वर्ष 9 महीने थी; सामान्य GK पुस्तकों में इसे लगभग 23 वर्ष लिखा जाता है।

गद्दी पर बैठने से पहले हुमायूँ को मध्य एशिया के बदख्शाँ क्षेत्र के प्रशासन का अनुभव था। बाबर के जीवनकाल में उसे विभिन्न सैन्य अभियानों और प्रांतीय प्रशासन की जिम्मेदारियाँ भी मिली थीं।

हुमायूँ के तीन प्रमुख भाई कामरान मिर्जा, अस्करी मिर्जा और हिंदाल मिर्जा थे। भाइयों की महत्वाकांक्षा और साम्राज्य के भीतर शक्ति-विभाजन आगे चलकर हुमायूँ के लिए बड़ी राजनीतिक समस्या बना।

02

दीनपनाह की स्थापना

Dinpanah — 1533 CE

हुमायूँ ने दिल्ली में यमुना नदी के निकट दीनपनाह नामक नगर की स्थापना का कार्य लगभग 1533 ई. में आरंभ कराया। इसका अर्थ लगभग “धर्म का आश्रय” माना जाता है।

दीनपनाह को हुमायूँ ने अपनी नई शाही राजधानी और विद्या-संस्कृति के केंद्र के रूप में विकसित करने की कल्पना की थी। बाद में शेरशाह सूरी ने इसी क्षेत्र में निर्माण कराए और यह परिसर पुराना किला क्षेत्र से जुड़ गया।

🎯 Exam Point

हुमायूँ — दीनपनाह — दिल्ली — लगभग 1533 ई.

03

प्रारंभिक अभियान

Kalınjar, Dauhria & Gujarat

राज्यारोहण के बाद हुमायूँ को अफगान सरदारों और क्षेत्रीय शासकों की चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उसने 1531 ई. में कालिंजर की ओर अभियान किया। इसी प्रारंभिक दौर में अफगान शक्तियों के विरुद्ध दौहरिया/दौराह के संघर्ष का उल्लेख भी मिलता है।

आपके मूल नोट में चार युद्धों के क्रम में “देवरा (1531)” लिखा था। इसे निश्चित रूप से “देवरा” लिखना भ्रमकारी है। परीक्षा पुस्तकों में दौहरिया/दौराह (1532) का युद्ध हुमायूँ और महमूद लोदी से जोड़ा जाता है, जबकि 1531 में कालिंजर अभियान भी महत्वपूर्ण था।

हुमायूँ को गुजरात के शक्तिशाली शासक बहादुर शाह से भी संघर्ष करना पड़ा। 1535 में उसने गुजरात और मालवा में सफलता प्राप्त की, लेकिन इन क्षेत्रों पर स्थायी नियंत्रण बनाए नहीं रख सका।

04

शेर खाँ सूरी का उदय

Rise of Sher Khan

हुमायूँ के लिए सबसे गंभीर चुनौती बिहार में उभरते अफगान नेता शेर खाँ से आई, जो बाद में शेरशाह सूरी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उसने बिहार में अपनी शक्ति मजबूत की और बंगाल की राजनीति में भी प्रभाव बढ़ाया।

हुमायूँ ने चुनार के किले पर अभियान किया, लेकिन प्रारंभिक अवसर पर शेर खाँ की शक्ति को निर्णायक रूप से समाप्त नहीं कर सका। बाद में शेर खाँ ने अपनी सैन्य और आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत कर ली कि वह मुगल सत्ता का मुख्य प्रतिद्वंद्वी बन गया।

05

चौसा का युद्ध

26 June 1539

26 जून 1539 ई. को वर्तमान बिहार के बक्सर के निकट चौसा में हुमायूँ और शेर खाँ के बीच निर्णायक युद्ध हुआ। आपके मूल नोट में 25 जून दिया गया था; सामान्यतः स्वीकार की जाने वाली तिथि 26 जून 1539 है।

इस युद्ध में शेर खाँ ने मुगल सेना को बुरी तरह पराजित किया। हुमायूँ किसी प्रकार गंगा पार करके अपनी जान बचाने में सफल हुआ।

चौसा की विजय के बाद शेर खाँ ने अपनी स्वतंत्र सत्ता अधिक स्पष्ट रूप से स्थापित की और ‘शेरशाह’ की उपाधि धारण की। उसने अपने नाम से सिक्के चलवाए और खुतबा पढ़वाया।

🎯 High Yield

चौसा — 26 जून 1539 — हुमायूँ बनाम शेर खाँ — शेर खाँ की विजय।

06

कन्नौज / बिलग्राम का युद्ध

17 May 1540

17 मई 1540 ई. को हुमायूँ और शेरशाह के बीच कन्नौज अथवा बिलग्राम का युद्ध हुआ। इस युद्ध में भी हुमायूँ पराजित हुआ।

इस विजय के बाद शेरशाह ने आगरा और दिल्ली पर अधिकार कर लिया और उत्तर भारत में सूर वंश की सत्ता स्थापित हुई। हुमायूँ को मुगल साम्राज्य छोड़कर पश्चिम की ओर पीछे हटना पड़ा।

कन्नौज की पराजय के साथ भारत में हुमायूँ के शासन का पहला चरण समाप्त हुआ और मुगल सत्ता लगभग 15 वर्षों के लिए बाधित रही।

07

निर्वासन और हमीदा बानो बेगम

Exile & Marriage — 1541

कन्नौज की पराजय के बाद हुमायूँ ने सिंध और आसपास के क्षेत्रों में आश्रय तथा समर्थन प्राप्त करने का प्रयास किया। यह कहना कि उसने पूरे 15 वर्ष केवल सिंध में घुमक्कड़ जीवन बिताया, सही नहीं है। उसका लगभग 15 वर्ष का निर्वासन सिंध, राजस्थान के मरुक्षेत्र, फारस, कंधार और काबुल सहित विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ा था।

निर्वासन के दौरान हुमायूँ ने हमीदा बानो बेगम से 1541 ई. में विवाह किया। सामान्यतः विवाह की तिथि 29 अगस्त 1541 दी जाती है।

हमीदा बानो बेगम शेख अली अकबर जामी की पुत्री थीं, जिन्हें मीर बाबा दोस्त भी कहा जाता था। वे हुमायूँ के भाई हिंदाल के आध्यात्मिक गुरु/धार्मिक मार्गदर्शक से जुड़े थे। आपके मूल नोट में “भारतवासी सिया मीर…” वाली पंक्ति इसी नाम के विकृत रूप के कारण भ्रमकारी थी।

08

अकबर का जन्म

AmarKot — 1542 CE

हुमायूँ के निर्वासन के दौरान हमीदा बानो बेगम ने 15 अक्टूबर 1542 ई. को सिंध के अमरकोट (उमरकोट) में अकबर को जन्म दिया। उस समय हुमायूँ की राजनीतिक स्थिति अत्यंत कमजोर थी।

अमरकोट के स्थानीय राजपूत शासक राणा प्रसाद ने हुमायूँ को आश्रय दिया था। इसी कठिन निर्वासन काल में जन्मा अकबर आगे चलकर मुगल साम्राज्य का महानतम शासक बना।

📗 याद रखें

अकबर — जन्म: 15 अक्टूबर 1542 — अमरकोट — माता: हमीदा बानो बेगम।

09

फारस में शरण

Shah Tahmasp I

भारत में सत्ता वापस पाने में असफल रहने के बाद हुमायूँ ने फारस के सफवी शासक शाह तहमास्प प्रथम से सहायता माँगी। शाह तहमास्प ने उसे सैन्य सहायता प्रदान की।

इस सहायता के बल पर हुमायूँ ने पहले कंधार और फिर काबुल पर अपना अधिकार पुनः स्थापित किया। इसके बाद उसने धीरे-धीरे अपनी स्थिति मजबूत की और भारत में वापसी का अवसर तलाशता रहा।

फारस में बिताए समय का मुगल दरबार की कला, चित्रकला, स्थापत्य और सांस्कृतिक शैली पर भी आगे चलकर प्रभाव पड़ा।

10

भारत में पुनः प्रवेश

Mughal Restoration — 1555

शेरशाह और उसके उत्तराधिकारी इस्लाम शाह की मृत्यु के बाद सूर साम्राज्य आंतरिक संघर्षों में उलझ गया। इस अवसर का लाभ उठाकर हुमायूँ ने भारत की ओर अभियान शुरू किया।

उसके सेनापति बैरम खाँ ने मुगल पुनर्विजय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1555 में मुगल सेनाओं ने पंजाब में सफलताएँ प्राप्त कीं और सरहिंद के युद्ध में सिकंदर सूरी की शक्ति को निर्णायक रूप से पराजित किया।

इसके बाद हुमायूँ ने दिल्ली और आगरा पर पुनः अधिकार कर लिया और 1555 ई. में मुगल सिंहासन पर दोबारा बैठा। आपके मूल नोट में “दिल्ली की गाड़ी” के स्थान पर सही शब्द दिल्ली की गद्दी है।

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हुमायूँ के प्रमुख युद्ध/अभियान

Important Battles & Campaigns

वर्षयुद्ध/अभियानप्रतिद्वंद्वी/महत्व
1531कालिंजर अभियानप्रारंभिक बुंदेलखंड अभियान
1532दौहरिया/दौराहमहमूद लोदी से संघर्ष
1539चौसाशेर खाँ से पराजय
1540कन्नौज/बिलग्रामशेरशाह से निर्णायक पराजय
1555सरहिंदसिकंदर सूरी की पराजय; मुगल सत्ता की वापसी

⚠️ Correction

पुरानी GK सूचियों में “देवरा (1531) → चौसा → बिलग्राम → सरहिंद” जैसा क्रम मिलता है। “देवरा” नाम अस्पष्ट है; इसलिए कालिंजर (1531) और दौहरिया/दौराह (1532) को अलग-अलग स्पष्ट रूप में याद करना बेहतर है।

12

हुमायूँ और ज्योतिष

Astrology & Court Life

हुमायूँ की ज्योतिष और ग्रह-नक्षत्रों में विशेष रुचि थी। उसके दरबार और दैनिक जीवन के बारे में ऐसे विवरण मिलते हैं जिनमें विभिन्न दिनों, ग्रहों और रंगों के बीच संबंध स्थापित किया गया था।

सामान्य परीक्षा-GK में प्रसिद्ध तथ्य है कि वह सप्ताह के सात दिनों के अनुसार अलग-अलग रंग के वस्त्र पहनता था। उदाहरणतः रविवार को सूर्य से संबंधित पीला रंग, सोमवार को चंद्रमा से संबंधित सफेद रंग जैसे ज्योतिषीय प्रतीकों से उसका व्यवहार जोड़ा जाता है।

इस तथ्य को कठोर प्रशासनिक “नियम” की अपेक्षा हुमायूँ की व्यक्तिगत ज्योतिषीय रुचि और दरबारी व्यवहार के रूप में समझना अधिक उचित है।

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हुमायूँनामा

Gulbadan Begum

‘हुमायूँनामा’ की रचना बाबर की पुत्री और हुमायूँ की बहन गुलबदन बेगम ने की थी। इसे अकबर के शासनकाल में लिखा गया।

इस ग्रंथ का मूल नाम अहवाल-ए-हुमायूँ बादशाह से भी जोड़ा जाता है। यह बाबर और हुमायूँ के परिवार, मुगल दरबार, यात्राओं और समकालीन घटनाओं की जानकारी देने वाला महत्वपूर्ण स्रोत है।

🎯 Exam Point

हुमायूँनामा — गुलबदन बेगम — हुमायूँ की बहन।

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हुमायूँ की मृत्यु

Death — January 1556

आपके मूल नोट में हुमायूँ की मृत्यु 1 जनवरी 1556 लिखी थी, जो सही नहीं है। जनवरी 1556 में दिल्ली स्थित दीनपनाह परिसर के शेर मंडल भवन में बने पुस्तकालय की सीढ़ियों से उतरते समय हुमायूँ गिर पड़ा और गंभीर रूप से घायल हो गया।

प्रचलित ऐतिहासिक विवरण के अनुसार वह 24 जनवरी 1556 को सीढ़ियों से गिरा और कुछ दिनों बाद 27 जनवरी 1556 ई. को उसकी मृत्यु हुई।

हुमायूँ की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अकबर मुगल सम्राट बना। उस समय बैरम खाँ ने अकबर के संरक्षक और प्रमुख सहयोगी के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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हुमायूँ का मकबरा

Humayun’s Tomb

दिल्ली में स्थित प्रसिद्ध हुमायूँ का मकबरा उसकी विधवा हाजी बेगम/बेगा बेगम की पहल पर बनवाया गया। इसका निर्माण 16वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुआ और इसके वास्तुकार के रूप में फारसी वास्तुकार मीराक मिर्जा गियास का नाम प्रसिद्ध है।

यह मकबरा भारतीय उपमहाद्वीप में विकसित भव्य मुगल उद्यान-मकबरा स्थापत्य के आरंभिक और महत्वपूर्ण उदाहरणों में है तथा बाद के मुगल स्थापत्य, विशेषकर ताजमहल की स्थापत्य परंपरा का महत्वपूर्ण पूर्ववर्ती माना जाता है।

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Quick Revision

SSC / Railway Rapid Recall

⚡ त्वरित रिविजन

1530—राज्यारोहण1533—दीनपनाह1539—चौसा1540—कन्नौज1541—हमीदा से विवाह1542—अकबर जन्मफारस1555—सरहिंद/दिल्ली वापसी1556—मृत्यु

⚡ Final Revision Points

हुमायूँ बाबर का पुत्र और दूसरा मुगल सम्राट था। उसका शासन 1530–1540 और 1555–1556 ई. में रहा।

वह 29 दिसंबर 1530 को लगभग 23 वर्ष की आयु में आगरा में सिंहासन पर बैठा। गद्दी पर आने से पहले उसे बदख्शाँ के प्रशासन का अनुभव था।

हुमायूँ ने लगभग 1533 ई. में दिल्ली में दीनपनाह की स्थापना की।

26 जून 1539 के चौसा युद्ध में शेर खाँ ने हुमायूँ को हराया। इसके बाद शेर खाँ ने शेरशाह की उपाधि धारण की।

17 मई 1540 के कन्नौज/बिलग्राम युद्ध में हुमायूँ पुनः शेरशाह से पराजित हुआ और मुगल सत्ता लगभग 15 वर्षों के लिए भारत से हट गई।

निर्वासन के दौरान हुमायूँ ने 29 अगस्त 1541 को हमीदा बानो बेगम से विवाह किया। 15 अक्टूबर 1542 को अमरकोट में अकबर का जन्म हुआ।

हुमायूँ ने फारस के शाह तहमास्प प्रथम से सहायता प्राप्त की और कंधार-काबुल पर पुनः अधिकार किया।

1555 में सरहिंद में सिकंदर सूरी की शक्ति पर विजय के बाद हुमायूँ ने दिल्ली और आगरा पुनः प्राप्त किए।

“देवरा 1531” वाला नाम अस्पष्ट है; प्रारंभिक घटनाओं में कालिंजर अभियान (1531) और दौहरिया/दौराह (1532) को स्पष्ट रूप में अलग रखना बेहतर है।

हुमायूँनामा की रचना उसकी बहन गुलबदन बेगम ने की।

हुमायूँ ज्योतिष में विश्वास रखता था और अलग-अलग दिनों को ग्रहों तथा रंगों से जोड़ता था।

हुमायूँ जनवरी 1556 में शेर मंडल पुस्तकालय की सीढ़ियों से गिरा और 27 जनवरी 1556 को उसकी मृत्यु हुई। उसके बाद अकबर उत्तराधिकारी बना।

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